लशकर से कोई संबंध नहीं: माओवदी नेता

लशकर से कोई संबंध नहीं: माओवदी नेता

भारत में माओवादियों के प्रमुख और सीपीआई (माओवादी) के महासचिव गणपति ने कहा है कि हाल में माओवादियों के कुछ वरिष्ठ नेता भले ही ग़िरफ़्तार हुए हों लेकिन उन्होंने सुरक्षा बलों को भारी नुकसान पहुंचाने में सफलता पाई है.

ये बातें उन्होंने बीबीसी बांग्ला के सुवोजीत बागची के ज़रिए भेजे गए सवालों के जवाब में कही हैं.

गणपति ने कहा है कि फ़िलहाल उनकी लड़ाई सामरिक बचाव की स्थिति में है. कुछ इलाक़ों में उनका वर्चस्व है तो कुछ इलाकों में सरकारी सुरक्षाबलों का वर्चस्व है.

उन्होंने कहा कि अभी कहना मुश्किल है कि अपनी बचाव क्षमता को मज़बूत करने में और कितना वक़्त लगेगा लेकिन उनका अगला उद्देश्य माओवादियों को ताक़त में 'दुश्मन' के बराबर ला खड़े करना है.

ये पूछे जाने पर कि माओवादी छापामारों के ख़िलाफ़ बड़े सरकारी अभियान का मुक़ाबला वो कैसे करेंगे, गणपति ने कहा कि पिछले कई सालों से राज्य और केंद्र में कई सरकारों ने बर्बरता से माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए अभियान छेड़े हैं.

उन्होंने ये भी कहा कि इस दौरान 'दुश्मन' ने सैंकड़ों आम लोगों, हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं की हत्या की लेकिन उन्हें कोई ख़ास सफलता नहीं मिली. बल्कि माओवादियों का प्रभाव आम लोगों में लगातार बढता गया है.

इस बारे में उन्होंने दावा किया कि अब माओवादियों का आधार दो तीन राज्यों से बढ कर 15 राज्यों में फैल गया है.

'जिहादियों से संबंध नहीं'

गणपति ने कहा है कि भारत सरकार ने माओवादी आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च किए हैं, स्थानीय गुटों को हथियार दिए हैं जिन्होंने बड़ी संख्या में आम लोगों पर अत्याचार किए हैं.

उन्होंने कहा कि सरकार ने माओवादियों के ख़िलाफ़ मनोवैज्ञानिक लड़ाई को आगे बढ़ाया है लेकिन इसके बावजूद सरकार विफल हुई है.

इस सवाल के जवाब नें कि क्या माओवादियों का पाकिस्तान की लश्करे-तैय्यबा और दूसरे इस्लामी चरमपंथी और जिहादी गुटों से कोई संबंध हैं इस पर सीपीआई माओवादी के महासचिव ने इसका ज़ोरदार खंडन किया.

गणपति ने कहा है हमारे इन गुटों के साथ कोई संबंध नहीं हैं. भारत की प्रतिक्रियावादी सरकार माओवादियों को बदनाम करने के लिए उनके संबंध पाकिस्तान की ख़ुफ़िया संस्था आईएसआई और चरमपंथी गुटों से जोड़ने के लिए दुष्प्रचार कर रही है.

इस्लामी जिहाद पर गणपति ने कहा है कि वो सभी मुस्लिम और अरब देशों में उपनिवेशवादी ताक़तों का विरोध करने वालों का समर्थन ज़रूर करते हैं लेकिन वो इन गुटों की कट्टरपंथी रूढीवादी विचारधारा का विरोध करते हैं.

गणपति ने श्रीलंका के पृथ्कतावादी चरमपंथी संगठन एलटीटीई के साथ भी अपने किसी संबंध से इनकार किया है.

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