ब्रह्मपुत्र बांध मसले पर प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप चाहते हैं असम व अरूणाचल
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने शुक्रवार को पत्रकारों से कहा, "पानी के बहाव को बड़े पैमाने पर दूसरी ओर मोड़ देने से राज्य की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा और इससे पर्यावरण संबंधी समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं।"
गोगोई की यह चेतावनी ऐसे समय में आई है, जब मीडिया में खबरें आई हैं कि चीन तिब्बत की राजधानी ल्हासा से 140 किलोमीटर दक्षिण पूर्व जांगमु में 16.70 करोड़ डॉलर की लागत से जल विद्युत संयंत्र लगाने की योजना बना रहा है। इसके साथ ही वह अपने उत्तर पश्चिम और उत्तर पूर्व के इलाके में पानी को मोड़ देना चाहता है। इसी इलाके में गोबी रेगिस्तान भी आता है।
2,906 किलोमीटर लंबी ब्रह्मपुत्र नदी एशिया की सबसे लंबी नदी है। इस नदी की शुरुआती 1,625 किलोमीटर लंबाई चीन के अधिकार वाले तिब्बत के हिस्से में पड़ती है, उसके बाद 918 किलोमीटर भारत में तथा बाकी का हिस्सा बांग्लादेश में पड़ता है।
अरूणाचल प्रदेश से कांग्रेसी सांसद तकाम संजय ने कहा है, "यदि चीन मनमाने ढंग से बांध का निर्माण करता है तो यह अंतर्राष्ट्रीय प्रोटोकाल का सरासर उल्लंघन होगा।"
गोगोई ने कहा है, "चीन बांध का निर्माण न करे, इसके लिए हम प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की मांग करेंगे। असम पर इसका विनाशकारी असर होगा।"
विशेषज्ञ भी महसूस करते हैं कि ब्रह्मपुत्र नदी पर बांध बनने से पूर्वोत्तर और बांग्लादेश पर उसका व्यापक असर पड़ेगा।
भूविज्ञानी सपना देवी का कहना है, "हम इस बात से चिंतित हैं कि यदि चीन अपनी योजना पर अमल करता है तो असम, अरूणाचल प्रदेश और बांग्लादेश के कई सारे इलाके सूख जाएंगे। इसके कारण क्षेत्र में पानी का बहाव बुरी तरह प्रभावित होगा, जिसका कृषि पर विपरीत असर पड़ेगा।"
मीडिया में आई खबरों के मुताबिक चीन शांक्सी, हेबेल, बीजिंग और तियानजिन में पानी के गंभीर संकट से निपटने के लिए पीली नदी (येलो रीवर) में 200 अरब क्यूबिक मीटर पानी डालने की योजना बना रहा है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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