भारत में मानसिक स्वास्थ्य तंत्र बेहद कमजोर: विशेषज्ञ
नई दिल्ली, 10 अक्टूबर (आईएएनएस)। एक अनुमान के अनुसार देश में दो करोड़ लोग मानसिक बीमारी से पीड़त हैं लेकिन मनोचिकित्सकों की संख्या मात्र 3,500 और नर्सों की संख्या 1,500 हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसिक बीमारियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की संख्या के लिहाज से भारत न सिर्फ पश्चिमी देशों से बहुत पीछे है बल्कि कुछ एशियाई देश भी हम से बहुत आगे हैं।
जी.बी. अस्पताल के मनारोग विभाग के प्रमुख आर.सी जिलोहा ने आईएएनएस को बताया, "भारत में मानसिक रोगियों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की संख्या बेहद कम है। भारत में 10 लाख आबादी पर मानसिक रोगों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की संख्या 0.4 है जबकि मालदीव में 10 लाख आबादी पर मनोचिकित्सकों की संख्या तीन है। भारत में नर्सो की संख्या 10 लाख आबादी पर 0.4 है जबकि श्रीलंका में यह संख्या 18 है।
उन्होंने कहा देश की एक से दो फीसदी आबादी मनोरोग से पीड़ित है और करीब पांच फीसदी आबादी मानसिक अवसाद की समस्या से पीड़ित है।
उन्होंने कहा कि देश में रोगियों की संख्या के हिसाब से मनोचिकित्सकों की संख्या का अनुपात बेहद खराब है। हमे बड़ी संख्या में मनोचिकित्सकों की जरूरत है।
जिलोहा ने कहा, "देश में मनोचिकित्सक तैयार करने वाले संस्थानों और शिक्षकों की संख्या बहुत कम है। उस पर बहुत से छात्र और शिक्षक पैसे और शोहरत के लिए विदेश चले जाते हैं। विदेश जाने वाले डॉक्टरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
उन्होंने कहा कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (दक्षेस)के ज्यादातर सदस्य देशों में मानसिक स्वास्थ्य पर सरकारी खर्च कुल स्वास्थ्य बजट के एक फीसदी से भी कम है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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