रिबोसोम पहले से औषधीय महत्व दर्शा रहे हैं : रामाकृष्णन
इस कार्य में मदद के लिए युनिवर्सिटी ऑफ उटाह और कैंब्रिज में मेडिकल रिसर्च काउंसिल की मॉलीक्यूलर बायोलॉजी प्रयोगशाला (एलएमबी) को धन्यवाद देते हुए रामाकृष्णन ने कहा है, "एलएमबी में इस तरह के दीर्घकालिक मौलिक शोध के समर्थन का विचार इस परिणाम का मार्ग प्रशस्त करता है। रिबोसोम पहले से अपने औषधीय महत्व को दर्शा रहा है।"
तमिलनाडु के चिदंबरम में 1952 में पैदा हुए रामाकृष्णन ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने से पहले बड़ौदा विश्वविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई की थी। उन्होंने 1976 में अमेरिका की ओहियो युनिवर्सिटी से भौतिकी में पीएचडी की। वर्तमान समय में वह ब्रिटेन में कैम्ब्रिज के एमआरसी लेबोरेटरी ऑफ मॉलीक्यूलरबॉयोलॉजी के स्ट्रक्च रल स्टडीज डिवीजन के ग्रुप लीडर एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।
14.20 लाख डॉलर का यह प्रतिष्ठित पुरस्कार रामाकृष्णन को अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस ए. स्टीट्ज तथा इस्राइल की वैज्ञानिक एडा ई.योनथ के साथ संयुक्त रूप से मिला है।
मेडिकल रिसर्च काउंसिल (एमआरसी) की ओर से कहा गया है कि रामाकृष्णन का शोध ट्युबरकुलोसिस के जटिल रूपों से लड़ने के लिए बेहतर दवाइयां विकसित करने का रास्ता खोल सकता है।
एमआरसी की ओर से कहा गया है कि रामाकृष्णन का रिबोसोम में अणुओं की व्यवस्था पर किया गया मौलिक शोध शोधकर्ताओं को ऐसे एंटीबायोटिक्स तैयार करने में मदद कर सकता है, जो बैक्टीरिया के संक्रमण से पीड़ित लोगों का इलाज करने में सक्षम होगा।
एमआरसी की ओर से एक बयान में कहा गया है, "बैक्टीरियाई रिबोसोम को बेहतर तरीके से निशाना बनाने की प्रक्रिया मानव कोशिकाओं पर नकारात्मक प्रभाव को टालने में मददगार हो सकती है और इस तरह एंटीबायोटिक्स लेने से होने वाले कुप्रभाव को कम किया जा सकेगा।"
रामाकृष्णन ने कहा है, "मैं अपनी प्रयोगशाला में काम करने वाले सभी प्रतिभावान सहयोगियों और छात्रों का बहुत आभारी हूं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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