भारतीय मूल के वैज्ञानिक को नोबल पुरस्कार (लीड-4)
लंदन, 7 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक वेंकटरामन रामाकृष्णन को रसायन शास्त्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दो अन्य वैज्ञानिकों के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 2009 के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। इस आशय की घोषणा बुधवार को स्टॉकहोम में की गई। इन वैज्ञानिकों ने दुनिया के सामने यह प्रस्तुत किया है कि डीएनए में संचित सूचनाएं जीवन में कैसे रूपांतरित होती हैं। इस प्रक्रिया का ज्ञान होने से संक्रामक रोगों के इलाज में काफी लाभ हुआ है।
14.20 लाख डॉलर का यह प्रतिष्ठित पुरस्कार रामाकृष्णन को अमेरिकी वैज्ञानिक थॉमस ए. स्टीट्ज तथा इस्राइल की वैज्ञानिक एडा ई.योनथ के साथ संयुक्त रूप से मिला है।
नोबल समिति की ओर से कहा गया है, "रिबोसोम्स की आंतरिक क्रिया प्रणाली जीव की वैज्ञानिक समझ के लिए महत्वपूर्ण है। यह ज्ञान व्यावहारिक और तात्कालिक इस्तेमाल में लाया जा सकता है। आज तमाम एंटीबायोटिक्स बैक्टीरियाई रिबोसोम्स की कार्यप्रणाली को रोक कर विभिन्न रोगों का इलाज करते हैं।"
समिति की ओर से कहा गया है, "इस वर्ष इन तीनों वैज्ञानिकों ने 3डी मॉडल तैयार किया है, जो यह दर्शाता है कि विभिन्न एंटीबायोटिक्स रिबोसोम से कैसे जुड़े होते हैं। वैज्ञानिक अब इन मॉडलों का इस्तेमाल नए एंटीबायोटिक्स के विकास में कर रहे हैं।"
तमिलनाडु के चिदंबरम में 1952 में पैदा हुए रामाकृष्णन ने आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका जाने से पहले बड़ोदा विश्वविद्यालय से बीएससी की पढ़ाई की। उन्होंने 1976 में अमेरिका की ओहियो युनिवर्सिटी से भौतिकी में पीएचडी की। वर्तमान समय में वह ब्रिटेन में कैम्ब्रिज के एमआरसी लेबोरेटरी ऑफ मॉलीक्यूलरबॉयोलॉजी के स्ट्रक्च रल स्टडीज डिवीजन के ग्रुप लीडर एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।
रामाकृष्णन से पहले रवींद्रनाथ टैगोर, सी. वी. रामन, हरगोबिंद खुराना, मदर टेरेसा, एस. चंद्रशेखर, अमर्त्य सेन और वी.एस. नायपाल भी इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजे जा चुके हैं।
नोबल समिति ने कहा है कि तीनों वैज्ञानिकों को रिबोसोम के क्षेत्र में काम करने के लिए यह पुरस्कार प्रदान किया गया है। रिबोसोम डीएनए सूचना को जीवन में रूपांतरित करता है। यह जीवन की एक प्रमुख प्रक्रिया है।
अपने अध्ययन में इन तीनों वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी पद्धति का इस्तेमाल कर उन लाखों अणुओं में से प्रत्येक की स्थिति का पता लगाने की कोशिश की है, जो रिबोसोम का निर्माण करते हैं।
सभी संरचनाओं की प्रत्येक कोशिका में डीएनए कण (मॉलीक्यूल्स) होते हैं। इनके पास इस बात का खाका (ब्लूप्रिंट) होता है कि कोई मानव, पौधा या बैक्टीरिया कैसा दिखता है और कैसे काम करता है। लेकिन डीएनए का कण निष्क्रिय होता है। यदि इसमें और कुछ न हो तो जीवन नहीं होगा।
रिबोसोम्स की बदौलत ये ब्लूप्रिंट सजीव पदार्थ में तब्दील होते हैं। वे रासायनिक स्तर पर जीवन का निर्माण और नियंत्रण करते हैं। जीवन को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए रिबोसोम्स को समझना जरूरी है। इस ज्ञान का व्यावहारिक एवं तत्काल इस्तेमाल संभव है। आजकल बहुत-सी एंटीबायोटिकदवाइयां कई बीमारियों का इलाज बैक्टीरियल रिबोसोम्स की सक्रियता को समाप्त करके करती हैं। इन रिबोसोम्स के अभाव में बैक्टीरिया का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसीलिए नए एंटीबायोटिक्स के लिए रिबोसोम्स अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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