भारतीय मूल के वैज्ञानिक को रासायनशास्त्र के लिए संयुक्त नोबेल पुरस्कार (लीड-2)
रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने इन वैज्ञानिकों को यह पुरस्कार रिबोसोम्स के विन्यास और कार्य के अध्ययन के लिए देने का फैसला किया है।
एकेडमी की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि रिबोसोम्स प्रोटीन बनाते हैं, जो बदले में सभी सजीव संरचनाओं के रसायन को नियंत्रित करते हैं। रिबोसोम्स जीवन के लिए बेहद अहम होने की वजह से नए एंटीबायटिक्स का मुख्य लक्ष्य भी हैं। इस अनुसंधान का इस्तेमाल नए एंटीबायोटिक्स बनाने में किया जा रहा है, जिससे जीवन की रक्षा होने के साथ-साथ रोगों से जुड़ी पीड़ाएं भी कम हो रही हैं।
तमिलनाडु के चिदंबरम में 1952 में जन्मे रामाकृष्णन ने 1976 में अमेरिका की ओहायो यूनिवर्सिटी से भौतिकी में पीएचडी की। वह इस समय ब्रिटेन में कैम्ब्रिज के एमआरसी लेबोरेटरी ऑफ मोलेक्यूलर बॉयोलॉजी के स्ट्रक्च रल स्टडीज डिवीजन के ग्रुप लीडर एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं।
उनसे पहले रवींद्रनाथ टैगोर, सी. वी. रामन, हरगोबिंद खुराना, मदर टेरेसा, एस. चंद्रशेखर, और अमर्त्य सेन भी इस प्रतिष्ठित सम्मान से नवाजे जा चुके हैं।
अपने अध्ययन में इन तीनों वैज्ञानिकों ने यह दर्शाया है कि रिबोसोम्स कैसे होते हैं और आणविक स्तर पर कैसे काम करते हैं। इन वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी पद्धति का इस्तेमाल कर उन लाखों अणुओं में से प्रत्येक की स्थिति का पता लगाने की कोश्शि की, जो रिबोसोम बनाते हैं।
सभी संरचनाओं की प्रत्येक कोशिका में डीएनए कण (मोलीक्यूल्स) होते हैं। इनके पास इस बात का खाका (ब्लूप्रिंट) होता है कि कोई मानव, पौधा या बैक्टीरिया कैसा दिखता है और कैसे काम करता है। लेकिन डीएनए का कण निष्क्रिय होता है। यदि यहां कुछ और न हो तो वहां कोई जीवन नहीं होगा।
रिबोसोम्स की बदौलत ये ब्लूप्रिंट सजीव पदार्थ में तब्दील होते हैं। वे रासायनिक स्तर पर जीवन का निर्माण और नियंत्रण करते हैं। जीवन को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए रिबोसोम्स को समझना जरूरी है। इस ज्ञान का व्यावहारिक एवं तत्काल इस्तेमाल संभव है। आजकल बहुत सी एंटीबायोटिक दवाएं कई बीमारियों का इलाज बैक्टीरियल रिबोसोम्स की सक्रियता को समाप्त करके करती हैं। इन रिबोसोम्स के अभाव में बैक्टीरिया का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसीलिए नए एंटीबायोटिक्स के लिए रिबोसोम्स अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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