बर्बाद हो गया रजोली गांव

उमर फ़ारूक़
बीबीसी संवाददाता, रजोली गांव से
आंध्र प्रदेश के इतिहास में आने वाली सबसे भयंकर बाढ़ ने हर तरफ विनाश फैलाया है जिसकी दूसरी मिसाल मुश्किल से ही मिलेगी. महबूबनगर ज़िले का रजोली गाँव इसका जीता जागता उदाहरण है.
कल तक हँसता खेलता यह गाँव कुछ ऐसा बर्बाद हुआ है कि इसका शायद ही कोई घर बाढ़ की मार से ध्वस्त होने से बचा है.
लगभग पंद्रह हज़ार की जनसंख्या वाला यह गाँव हैदराबाद से 250 किलोमीटर दूर महबूबनगर ज़िले में कर्नाटक की सीमा पर तुंगभद्र नदी और सुन्केसला बाँध के बिलकुल बगल में स्थित बहुत ही संपन्न और खुशहाल गाँव था. लेकिन एक अक्टूबर की रात ने इस गाँव के जीवन को बिल्कुल उलट पलट कर रख दिया.
मैं जब घुटनों बराबर कीचड़ और पानी में से गुज़रकर इस गाँव में पंहुचा तो एक दिल दहला देने वाला दृश्य मेरा इन्तज़ार कर रहा था. जहाँ सैंकड़ों लोग, महिलाएं, पुरुष और बच्चे अपने घरों के मलबे से कीचड़ में लथपथ सामान ढूंढ कर निकल रहे थे और कुछ रोने पीटने में लगे थे.
वहीं पूरी बस्ती को देखकर ऐसा लग रहा था की जैसे वहाँ कोई भूकंप आया हो, या वो कोई युद्ध का मैदान हो या फिर वहां किसी ने बमबारी की हो.
विनाशकारी दृश्य
गाँव की सबसे बड़ी सड़क पर, जहाँ दोनों तरफ दुकानें थीं. अब हर तरफ पानी में भीगा, सड़ा हुआ अनाज और दूसरा सामान बिखरा हुआ था. वातावरण में एक अजीब सी बू थी. हर चीज़ कीचड से भरी थी और हर तरफ ढेरों घास फूस और दूसरा कचरा था जो बाढ़ के पानी के साथ इस गाँव में आया था.
बिजली के खंभों और तारों पर भी लकड़ियां, घास फूस आदि चीज़ें इस बात की याद ताज़ा कर रही थीं कि गुरुवार की उस रात कितनी ऊंचाई तक पानी इस गाँव में घुस आया था.
ऊपर हवा में भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर चक्कर काट रहे थे जिससे पीने का पानी और खाने के पैकेट गिराए जा रहे थे.लेकिन इस से बेखबर 50 वर्षीय वेंकम्मा एक टूटे हुए घर के सामने खड़ी रोती चिल्लाती मिलीं.
वो केवल एक ही बात कहे जा रही थी, "अब हमारा क्या होगा. अब कौन हमारी सहायता करेगा". इस महिला का घर और उस की हर चीज़ बाढ़ की भेंट चढ़ गई थी.
उस महिला का असल ग़म यह था कि उसकी बेटी का पूरा दहेज़ उसी बाढ़ में बह गया. वो कहती हैं, "अब मैं क्या करुं, कहां जाऊं. मेरी बच्ची की शादी में केवल दो महीने रह गए हैं."
उससे थोड़ी ही दूर पर रमेश शेट्टी थे जो कपडों की दुकान चलाते थे और अब कीचड़ में दबे कुचले कपड़ों का ढेर सड़क पर डाले उसे बड़े दुःख और हसरत से देख रहे थे.
वो कहते हैं, "मेरा सब कुछ ख़त्म हो गया है. कुछ नहीं बचा. अब मुझे मेहनत कर के अपने बच्चों का पेट पालना पड़ेगा."
रमेश ने उस भयंकर रात की याद ताज़ा करते हुए बताया, "पहले तेज़ बारिश हुई और आहिस्ता आहिस्ता तुंगभद्र नदी में पानी बढ़ने लगा और यह बात फैलने लगी कि गाँव में बाढ़ आ गई. लेकिन पहले भी कई बार ऐसे बातें हुईं और बाढ़ नहीं आई इसलिए लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया. गुरूवार की रात नौ बजे से गाँव में पानी बढ़ने लगा और लोग परेशान होने लगे और अन्त में आधी रात के बाद, जब घटाटोप अँधेरा था, सुन्केसुला डैम टूट गया और गाँव में बाढ़ आ गई.’’
कोई भविष्य नहीं
वो एक दिल दहला देने वाला ऐसा दृश्य था जिसे इस गाँव के लोग कभी नहीं भुला पाएंगे.
एक बुनकर मोहम्मद हनीफ ने रोते हुए बताया कि जैसे ही एक भयंकर आवाज़ के साथ बाढ़ आई. जो जिधर भाग पाया भाग गया. वो कहते हैं, "हम ने बड़ी मुश्किल से जान बचाई और बच्चों को लेकर अंधेरे में भाग खड़े हुए. हम सब तबाह हो गए. कुछ भी नहीं बचा. हमारे पास केवल शरीर के कपड़े रह गए हैं."
इसे एक चमत्कार ही कह सकते हैं कि इतनी भयंकर तबाही के बाद भी केवल पन्द्रह जाने गईं लेकिन स्थानीय लोगो का कहना था कि बच जाने वाली ज़िन्दगी भी कुछ कम डरावनी नहीं है.
बाढ़ के बाद लगभग चौबीस घंटे तक रजोली मौत और ज़िन्दगी के बीच झूलता रहा. जो गाँव के बाहर नहीं जा सके.
वो गाँव की कुछ बहुमंज़िली भवनों पर चढ़ कर मदद की प्रतिक्षा करते रहे.
रमेश ने बताया कि उन्होंने और दूसरे लोगों ने लगातार फ़ोन पर अधिकारीयों से किया और सहायता मांगी लेकिन चौबीस घंटों तक कोई मदद नहीं मिली.
वो कहते हैं, "हम बीस घंटों तक हम बिना खाने और पानी के रहे. बच्चे भूख से रो रहे थे. मधुमेह के मरीज़ भूख के मारे बेहोश हो गए.हम यह कभी नहीं भुला पाएंगे.’’
65 वर्षीय भूतलिंगम का कहना था कि सौ वर्ष से भी पुराना यह गाँव अब शायद कभी दोबारा न बस पाए. ट्रैक्टर पर सामान लादते हुए उन्होंने कहा, "अब इस गाँव का कोई भविष्य नहीं रह गया".
चार पांच दिन बाद भी लोगों में आतंक इतना था कि जब मैं गाँव में था तब ही वहां भगदड़ मच गई कि कर्नाटक में तुंगभद्र का एक और बाँध
टूट गया है और पानी आ रहा है. औरतें और बचे रोते हुए भागने लगे और गाँव से बाहर जाने वाले एकमात्र रास्ते पर ट्रैफिक जाम हो गया.
हालांकि उस समये कुछ सरकारी कर्मचारी खाने और पानी के पैकेट, बिस्कुट और दूसरी चीज़ें लोगो में बाँट रहे थे और कुछ गैर सरकारी संगठनें भी सहायता ला रही थीं. लेकिन लोगों में बहुत क्रोध और गुस्सा था और वो राजनेताओं को बुरा भला कह रहे थे.
मैं जब वहां से वापस जाने के लिए बाहर निकला तो गाँव की सीमा पर हजारों लोगों और कई ट्रैक्टरों की कतार लगी थी जो पानी और कीचड से मुश्किल से गुज़र रहे थे.
वापसी में मैंने यह भी देखा की लोग भले ही इस त्रासदी के कारण हिल गए हों और नीरस हो गये हों लेकिन उन का हौसला और मजाकिया स्वभाव ख़त्म नहीं हुआ था.
गाँव के बाहर ठहरे हुए पानी में मैंने दो महिलाओं को कैसेट प्लेयर और रेगुलेटर धोते हुए देखा. जब मैंने उनसे कहा कि गंदे पानी में डुबाने से तो वो ख़राब हो जाएंगे तो उन्होंने कहा कि वो वैसे भी काम नहीं करेंगे इस लिए अच्छा है के उन्हें कीचड़ से तो साफ़ रखा जाये.
मैं जब उन की तस्वीर ली तो उन्हों ने कहा, "ज़रा अच्छी फोटो लेना. कहाँ छपेगी यह".
जहाँ यह महिलाएं हौसला दिखने वाली बात कर रही थीं वहीं कुछ इंसानों के अन्दर का शैतान इस दुःख की घडी में भी अपना काम कर रहा था. जब लोग जान बचने भाग रहे थे, तभ कुछ लोग उनके घरों को लूट रहे थे!


Click it and Unblock the Notifications