राजस्थान के लुप्त होते लोक संगीत को मिली सशक्त आवाजें

जोधपुर, 5 अक्टूबर (आईएएनएस)। राजस्थान के दूरस्थ गांवों के पारंपरिक लोक संगीत को मुख्यधारा में लाने के लिए इसे कई प्रख्यात आवाजें मिल गई हैं।

एक अक्टूबर से यहां के मेहरानगढ़ किले में शुरू हुए पांच दिवसीय 'राजस्थान अंतर्राष्ट्रीय लोक उत्सव' (आरआईएफएफ) में संरक्षण और लोकप्रियता के अभाव में रेगिस्तानी गांवों के लुप्त हो रहे लोक संगीत को बढ़ावा दिया जा रहा है।

राजस्थानी सारंगी और शास्त्रीय संगीत के देश के प्रख्यात कलाकार उस्ताद सुल्तान खान ने शनिवार को आरआईएफएफ में 'लोक संगीत की शास्त्रीय संगीत से मुलाकात' कार्यक्रम के तहत 'मरु तरंग' संगीत प्रस्तुत किया। ऐसा करते हुए उन्होंने शास्त्रीय संगीत व लोक संगीत के बीच खींची दीवार को गिरा दिया। उन्होंने मारवाड़ के हाशिए पर पड़े लोक संगीतकारों के लिए यह कार्यक्रम पेश किया।

कई बॉलीवुड फिल्मों में संगीत दे चुके और 'डूरन डूरन' व 'बीटल्स' बैंड के साथ काम कर चुके सुल्तान खान ने आईएएनएस से कहा, "मैं राजस्थानी लोक संगीत को पसंद करता हूं इसलिए मैं लोक संगीत पर रोशनी डालना व प्रतिभाशाली लोक संगीतकारों के साथ काम करना चाहता हूं।"

उन्होंने कहा, "लोक संगीत याददाश्त पर आधारित होता है और इसे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक मौखिक रूप में पहुंचाया जाता है इसलिए इसका शास्त्रीय संगीत जितना परिष्कृत होना मुश्किल है। लोक संगीत की कोई लिखित रचना नहीं होती जबकि शास्त्रीय संगीत के लिए विभिन्न घरानों का सख्त व्याकरण होता है।"

सुल्तान खान कहते हैं, "अपनी असीम ऊर्जा और रंगों की वजह से लोक संगीत देखने योग्य है जबकि अपनी कोमलता की वजह से शास्त्रीय संगीत सुनने योग्य होता है।"

आरआईएफएफ की निदेशक दिव्या भाटिया ने कहा कि मरु तरंग पहली बार दिसम्बर 2008 में प्रस्तुत किया गया था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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