न्यायाधीशों की संपत्ति मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने किया उच्च न्यायालय का रुख (लीड-2)
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में शीर्ष अदालत के सभी न्यायाधीशों के लिए संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करना भी अनिवार्य करने का आदेश दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारियों के अनुसार, न्यायालय के पास दो विकल्प थे। पहला, उच्च न्यायालय की एकल पीठ के फैसले को उच्च न्यायालय में ही दो सदस्यीय खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी जाए।
दूसरा विकल्प यह था कि सर्वोच्च न्यायालय मामले को विशेष याचिका (स्पेशल लीव पिटिशन) के जरिए सुनवाई के लिए स्वयं अपने पास बुलवा ले।
खुद से जुड़ा मामला होने की वजह से सर्वोच्च न्यायालय ने इसे उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष उठाना ही मुनासिब समझा।
इससे पहले दिल्ली निवासी सुभाषचंद्र अग्रवाल को भेजे पत्र में सर्वोच्च न्यायालय के अतिरिक्त रजिस्ट्रार राजपाल अरोड़ा ने सूचित किया था कि सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में दिल्ली उच्च न्यायालय की ओर दुबारा रुख करेगा।
अग्रवाल की ही याचिका पर केंद्रीय सूचना आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संपत्ति को सार्वजनिक करने का निर्देश दिया था।
अरोड़ा ने अग्रवाल को भेजे पत्र में कहा है, "दो सितंबर 2009 को दिल्ली उच्च न्यायालय की एकल पीठ द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफयाचिका तैयार की जा चुकी है। लेकिन दिल्ली उच्च न्यायालय में अवकाश और रजिस्ट्री बंद होने के कारण याचिका दाखिल नहीं की जा सकी।"
यद्यपि, प्रधान न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उनका कार्यालय इस कानून के अधीन नहीं आता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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