नेपाल में जीवित है गांधी का सपना

काठमांडू, 1 अक्टूबर (आईएएनएस)। महात्मा गांधी ने वर्षो में पहले लोगों को आत्मनिर्भर बनाने का जो ख्वाब देखा था, वह आज भी नेपाल में जीवित है। आज भी कई लोग यहां गांधी जी के बताए रास्ते पर चल रहे हैं।

बहुत कम लोगों को पता होगा कि नेपाल के मशहूर पर्यटन स्थल पाटन और लाजिमपाट बापू की दूरदृष्टि से ही प्रभावित है। यहां स्थित महाघुटी बाजार बापू के सपनों साकार कर रहा है।

यहां के महाघुटी में हस्तकला के आकर्षक नमूने देखे जा सकते हैं। नेपाल में गांधी के सपनों को साकार करने वालों में प्रमुख नाम तुलसी मेहार श्रेष्ठ का है। उन्हें नेपाल का महात्मा गांधी कहा जाता है हालांकि वर्ष 1978 में उनकी मौत हो गई लेकिन आज भी गांधी के इस शिष्य के बताए रास्ते पर महाघुटी बाजार चल रहा है।

श्रेष्ठ ने नेपाल में जाति व्यवस्था और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्र शमशेर जंग बहादुर ने देश से निर्वासित कर दिया था लेकिन बाद में खुद महात्मा गांधी ने चंद्र शमसेर को पत्र लिखा था कि श्रेष्ठ को नेपाल आने की अनुमति दी जाए।

जब श्रेष्ठ काठमांडू पहुंचे तो उन्होंने यहां देश के पहले हस्तकरघा इकाई की स्थापना की। इसमें उन्होंने उन धागों का प्रयोग किया, जिसे गांधी जी ने उन्हें भेंट स्वरूप दिया था। इस इकाई का नाम 'नेपाल चरखा प्रचारक गांधी स्मारक महाघुटी' रखा गया, जो अब महाघुटी के नाम से जाना जाता है।

इस हस्तकरघा इकाई से होने वाले लाभ का 40 फीसदी विधवाओं और समाज की उपेक्षित महिलाओं के कल्याण के लिए खर्च किया जाता है। काठमांडू स्थित त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे के समीप ही तुलसी मेहर महिला आश्रम है, जहां महिलाओं को सिलाई, बुनाई और साक्षरता का पाठ पढ़ाया जाता है।

वर्ष 1977 में भारत सरकार ने श्रेष्ठ को उल्लेखनीय सामाजिक कार्यो के लिए 'नेहरू सम्मान' से सम्मानित किया था। पुरस्कार स्वरूप मिली राशि से ही श्रेष्ठ ने तुलसी मेहर महिला आश्रम की स्थापना की थी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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