देश भर में रावण दहन के साथ मनाया गया दशहरा (राउंडअप)

भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला दशहरा, बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इससे पहले नवरात्रि के दौरान अनेक स्थानों पर रामलीलाएं आयोजित की गइर्ं।

दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले के समीप रामलीला मैदान में हजारों लोग शहर की सबसे पुरानी रामलीला देखने के लिए उमड़ पड़े थे। यहां 150 वर्ष से भी अधिक समय से रामलीला आयोजित की जा रही है।

रावण दहन से पहले उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी, दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और कांग्रेस के अन्य नेताओं ने यहां रामलीला मैदान में राम-रावण युद्ध का आनंद उठाया।

इसके अलावा दिल्ली भर में रावण, उसके बेटे मेघनाद और भाई कुंभकर्ण के पुतले जलाए गए।

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में एक संगठन ने रावण के बदले मुंबई हमले के मुख्य आरोपी अजमल आमिर कसाब का पुतला जलाया।

काठीवाला टैंक दशहरा उत्सव समिति के सदस्य निखिल अग्रवाल ने कहा, "वर्तमान समय में आतंकवाद सबसे बड़ा शत्रु है इसलिए हमने रावण के बजाय कसाब का पुतला जलाने का निर्णय लिया।"

कसाब का 100 फुट ऊंचा पुतला बनाया गया था जिसका वजन लगभग 4,000 किलोग्राम था।

अग्रवाल ने कहा कि सरकार अभी तक कसाब को दण्ड देने में असफल रही है। हम इसके माध्यम से नागरिकों की भावनाओं के बारे में संदेश दे सकते हैं।

अग्रवाल ने कहा कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब मध्यप्रदेश में दशहरा के अवसर पर रावण की जगह एक आतंकवादी का पुतला जलाया गया है। मुंबई के वर्ली इलाके के लोग हर साल दशहरा पर अल कायदा सरगना ओसामा बिन लादेन का पुतला जलाते हैं।

अंबाला शहर में रावण का विशाल पुतला जलाया गया। वहां की रामलीला समिति का दावा है कि 15 मंजिली इमारत के बराबर 175 फुट लंबा रावण का यह पुतला देश का सबसे ऊंचा पुतला था।

अंबाला शहर से 20 किलोमीटर दूर अंबाला-जगाधरी मार्ग पर बरारा गांव में इस पुतले को जलाया गया।

रामलीला समिति के अध्यक्ष तेजिंदर सिंह चौहान ने आईएएनएस को बताया, "रावण को पहुंचाने और उसे खड़ा करने के लिए हमें को क्रेनों का इस्तेमाल करना पड़ा। यह एक मुश्किल काम था। यह देश का सबसे लंबा रावण है और इसे देखने यहां हजारों लोग आ रहे हैं।"

रावण के इस पुतले के निर्माण के लिए उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से 20 कारीगरों को बुलाया गया था। ये सभी मुसलमान थे।

इस पुतले का वजन करीब 3,000 किलोग्राम था। इसे बनाने में 400,000 रुपये से अधिक की लागत आई थी।

पुतला बनाने वाले कारीगरों के दल के मुख्य कारीगर मोहम्मद उस्मान ने कहा, "रावण के पुतले में 100,000 रुपये के पटाखे लगाए गए थे। विशाल आकृति के लिए बांस के डंडों का उपयोग किया गया है। बांस के इन डंडों से 50 झोंपड़ियां तैयार की जा सकती थीं।"

समिति ने 2007 में 151 फुट लंबा और 2008 में 171 फुट लंबा पुतला बनाया था। अगले साल 200 फुट लंबा पुतला बनाने का समिति का इरादा है।

चार दिनों के रात-दिन के शोर-गुल भरे समारोह के बाद सोमवार को दुर्गा पूजा का भी समापन हो गया। हजारों श्रद्धालुओं ने मां दुर्गा की प्रतिमाओं को अश्रुपूर्ण आंखों से विदाई दी।

पश्चिम बंगाल में परंपरा का निर्वहन करते हुए देवी दुर्गा की प्रतिमाओं के साथ लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश और कार्तिक की प्रतिमाओं को भी हर्षोल्लास के साथ गंगा व राज्य की अन्य नदियों में विसर्जित किया गया।

इस अवसर पर महिलाओं ने प्रतिमाओं को व आपस में एक-दूसरे को सिंदूर लगाया। उन्होंने देवताओं को मिठाई का भोग भी चढ़ाया।

एक श्रद्धालु संदीप्ता बसु ने कहा, "मैं 'सिंदूर खेला' (सिंदूर लगाना) का पूरा आनंद ले रही हूं। शादी के बाद यह मेरी पहली दुर्गा पूजा है।"

परंपरा का निर्वहन करते हुए विवाहित महिलाओं ने अपने परिवार की सुख समृद्धि व पति की लंबी आयु की कामना की।

कलम और किताबों के साथ स्कूली बच्चे भी पंडालों में नजर आए। उन्हें विश्वास था कि अच्छे शैक्षिक भविष्य के लिए देवी दुर्गा उन्हें आशीर्वाद देंगी।

मूर्ति विसर्जन के बाद बंगाली लोगों ने एक-दूसरे को शुभ बिजोया (विजयादशमी की बधाई) कहा और एक-दूसरे के घर मिठाइयां बांटी।

राज्यभर में मूर्तियों का विसर्जन एक ही दिन नहीं होता है। पारंपरिक रूप से पूजा आयोजित करने वाले दशमी के दिन विसर्जन करते हैं जबकि सामुदायिक रूप से पूजा आयोजित करने वाले कुछ लोग एक-दो दिन बाद प्रतिमाएं विसर्जित करते हैं।

एक पुलिस अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, "विसर्जन स्थल के घाटों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई है। आज प्रमुख रूप से पारंपरिक मूर्तियों और कुछ सामुदायिक पूजा की मूर्तियों का विसर्जन होगा। जबकि कुछ सामुदायिक मूर्तियों का विसर्जन मंगलवार और बुधवार को होगा।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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