बकरों के लिए वरदान बना सूखा!
पिछले वर्ष की विनाशकारी बाढ़ के बाद अब भयानक सूखा ने ग्रामीण इलाकों में त्योहार का रंग फीका कर दिया है। लोग सादगी के साथ त्योहार मनाने को मजबूर हो गए हैं।
तमाम लोग अभी तक वर्ष 2008 की बाढ़ के प्रभाव से ही उबर नहीं पाए थे। अब सूखे ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। पिछले वर्ष बाढ़ के कारण सैकड़ों लोगों की मौत हो गई थी और 30 लाख से अधिक लोग बेघर हो गए थे।
त्योहारों पर यहां बकरों की बलि की परंपरा है, लेकिन इस वर्ष बलि के लिए बहुत कम जानवर खरीदे गए हैं।
सरकार द्वारा सूखाग्रस्त घोषित 26 जिलों में से एक औरंगाबाद के एक ग्रामीण मुन्ना सिंह कहते हैं, "सूखे के कारण हमने बकरे की बलि चढ़ाने की योजना रद्द कर दी है।"
मामूली बारिश के कारण मुन्ना सिंह सहित अन्य किसानों की धान की फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गई हैं।
जहानाबाद जिले के एक ग्रामीण राम मोहन शर्मा ने आईएएनएस से कहा, "सूखे ने बकरों की जान बचा दी है।"
मुन्ना सिंह और शर्मा दोनों प्रति वर्ष देवी को प्रसन्न करने के लिए बकरों की बलि चढ़ाते थे। लेकिन आज बकरे खरीदने के लिए उनके पास पैसे का अभाव है।
सिर्फ यही दो व्यक्ति ऐसे नहीं हैं, पूरे बिहार के सूखाग्रस्त इलाकों में ऐसी ही कहानी है। सूखे के कारण सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, अररिया और पूर्णिया जिलों में त्योहार का मजा फीका हो गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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