लखनऊ में उर्दू और पंजाबी में होती है रामलीला
लखनऊ, 26 सितम्बर (आईएएनएस)। यहां मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और लंकापति रावण के मुख से छंद और चौपाई नहीं बल्कि उर्दू और पंजाबी में संवाद निकलते हैं। यह है 'उर्दू-पंजाबी रामलीला' जो लखनऊ की पहचान बन गई है। इस रामलीला की शुरुआत भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद यहां आने वाले शरणार्थियों ने की थी।
'आलमबाग रामलीला समिति' के महामंत्री संजय कुमार ने आईएएनएस से कहा, "बंटवारे के बाद पंजाब प्रांत में रहने वाले शरणार्थियों ने यहां आकर वर्ष 1951 में इस रामलीला की शुरुआत की क्योंकि उनकी स्थानीय भाषा पंजाबी और उर्दू हुआ करती थी इसलिए उन्होंने रामलीला भी उर्दू और पंजाबी में ही शुरू की।"
कुमार के मुताबिक उस समय लालटेन की रोशनी में रामलीला का मंचन किया जाता था। तकनीकी संसाधनों के अभाव में यह काम काफी चुनौतीपूर्ण हुआ करता था। समय के साथ रामलीला में बदलाव हुआ है।
इस रामलीला के कलाकारों की अदाकारी देखकर लगता है कि मानो सभी प्रशिक्षित कलाकार हैं लेकिन इनमें से किसी ने न तो अदाकारी का कोई प्रशिक्षण लिया है और न ही कोई पेशेवर कलाकर है।
इस रामलीला से करीब 100 लोग जुड़े हैं, जिनमें 10 साल के बच्चे से लेकर 60 साल के बुजुर्ग तक शामिल हैं। महिलाओं के किरदार भी पुरुष निभाते हैं। महिलाओं को इस रामलीला में शामिल नहीं किया जाता।
पिछले 30 साल से हनुमान का किरदार निभाने वाले सरदार जसवंत सिंह कहते हैं, "पुराने समय में महिलाओं को रामलीला में भाग लेने की आजादी नहीं थी। तब से यह परंपरा लगातार चली आ रही है, जिसका हम लोग निर्वहन करते आ रहे हैं।"
सिंह के अनुसार इसमें भाग लेने वाले कलाकार व्यवसायी हैं। किसी की जूते की दुकान है तो कोई चाय की दुकान चलाता है।
आलमबाग इलाके के वेजीटेबल मैदान में होने वाली यह रामलीला देखने के लिए दशर्कों को तीन रुपये का टिकट लगता है। मंच चारों ओर से सजावटी पंडाल से घिरा रहता है, जिसमें करीब दो हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था होती है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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