'ढाकियों' के लिए सौगात की तरह है दुर्गा पूजा
कोलकाता, 26 सितम्बर (आईएएनएस)। दुर्गा पूजा तमाम लोगों के लिए आस्था का विषय हो सकता है, लेकिन कुछ लोगों के लिए यह त्योहार सीधे रोटी से जुड़ा हुआ है। पश्चिम बंगाल के पूजा पंडालों में ढाक (बड़े आकार का ढोल) बजाने वाले ढाकियों की स्थिति कुछ ऐसी ही है।
पूर्वी मिदनापुर में महिशादल के रहने वाले 45 वर्षीय दिलीप घोरुई रिक्शा चलाकर पूरे साल भर मुश्किल से अपने परिवार का पेट पाल पाते हैं। लेकिन दुर्गापूजा के दौरान ढाक बजा कर वह थोड़ी अतिरिक्त कमाई कर लेते हैं।
हर वर्ष दुर्गापूजा के दौरान चार दिनों के लिए घोरुई और उसके परिवार को जैसे एक नया जीवनदान मिल जाता है। इस अवसर पर वह ढाक बजाकर अतिरिक्त कमाई कर लेता है। यह वाद्य यंत्र पश्चिम बंगाल में मुख्य रूप से धार्मिक त्योहारों के दौरान खास तौर से बजाया जाता है।
घोरुई कहते हैं, "हम पूरे साल दुर्गापूजा आने का इंतजार करते हैं। मैं जिले के एक सबसे दूरवर्ती इलाके में स्थित पहलानपुर गांव में रहता हूं। वहां आजीविका कमाने के बहुत विकल्प नहीं हैं।"
घोरुई ने आईएएनएस को बताया, "हम अपने रोजमर्रा के जीवन में भयानक गरीबी का सामना करते हैं और रिक्शा खींच कर किसी तरह जीवनयापन करते हैं। पूजा के दौरान हम कोलकाता के पूजा पंडालों में ढाक बजाकर थोड़ी कमाई कर सकते हैं।"
घोरुई के अनुसार ज्यादातर ढाकी कोलकाता आते हैं और शहर के विभिन्न पूजा पंडालों में ढाक बजाने का काम करते हैं। पूजा शुरू होने से दो दिन पहले वे यहां आ जाते हैं और दशहरे तक यहां रुकते हैं। पूजा के अंतिम दिन दुर्गा की मूर्तियों का विसर्जन हुगली नदी में या अन्य जलाशयों में किया जाता है।
घोरुई अपने पांच साथियों के साथ दक्षिणी कोलकाता में संघमित्रा समूह द्वारा आयोजित दुर्गा पूजा में ढाक बजाने आए हुए हैं।
एक अन्य ढाकी नारायण मैती ने कहा, "मुझे पता है कि मेरा परिवार मेरे लौटने का इंतजार कर रहा है। दुर्गा पूजा के दौरान हम प्रति व्यक्ति 700 से 1,000 रुपये तक कमा लेते हैं।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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