कुल्लू दशहरे में दो देवता नहीं होंगे आमंत्रित!
कुल्लू (हिमाचल प्रदेश), 25 सितम्बर (आईएएनएस)। हिमाचल प्रदेश के प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा उत्सव का रंग इस बार फीका पड़ने वाला है। समारोह शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न हो जाए, इसके लिए आयोजक 'दो देवताओं' को आमंत्रित नहीं कर रहे हैं।
आयोजक इस बार दशहरे में शताब्दियों पुरानी एक परंपरा तोड़ रहे हैं। दो देवताओं 'श्रींगा ऋषि' और 'बालू नाग' को पहली बार पूजा में आमंत्रित नहीं किया जा रहा है। दरअसल दोनों देवताओं के अनुयायी पिछले कुछ सालों से अपने-अपने देवताओं की श्रेष्ठता को लेकर आपस में संघर्ष कर रहे हैं।
इसी वजह से आयोजकों ने 28 सितम्बर से शुरू हो रहे उत्सव में इन दो देवताओं को आमंत्रित नहीं करने का फैसला किया है।
कुल्लू के उप पुलिस आयुक्त बी. सी नान्टा ने आईएएनएस से कहा, "इस बार हमने दोनों देवताओं के अनुयायियों से कहा है कि वे दशहरा उत्सव में शामिल होने से पहले अपने झगड़े सुलझा लें। आध्यात्मिक गुरुओं से इस संबंध में सलाह-मशविरा करने के बाद हमने तय किया है कि हम उन्हें आमंत्रण नहीं देंगे।"
स्वतंत्रता के बाद से ही जिला प्रशासन हर साल स्थानीय देवताओं को समारोह में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित करता था।
उत्सव की शुरूआत 1637 में कुल्लू में राजा जगत सिंह के शासन के समय हुई थी। जगत सिंह दशहरा के अवसर पर कुल्लू में प्रमुख देवता भगवान रघुनाथ (कुल्लू घाटी में भगवान राम के नाम से जाने जाते हैं) के सम्मान में एक परंपरा का निर्वहन करने के लिए सभी स्थानीय देवताओं को बुलाते थे। तभी से कुल्लू व आस-पास की घाटियों के सैकड़ों गांवों के देवताओं की वार्षिक सभा का आयोजन एक परंपरा बन गई है।
हर साल करीब 200 देवताओं के साथ उनके हजारों अनुयायी भगवान रघुनाथ को प्रणाम करने के लिए पहुंचते हैं।
पुलिस अधीक्षक के. के. इंदौरिया ने कहा है कि सप्ताहभर के उत्सव के दौरान किसी भी अप्रिय घटना से निपटने व भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था की गई है।
देश के अन्य हिस्सों में आयोजित होने वाले दशहरा उत्सवों से विपरीत कुल्लू दशहरा उत्सव में रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले नहीं जलाए जाते हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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