ध्यान व संवाद से चिकित्सकों में कम होता है गुस्सा
न केवल तनाव को कम किया जा सकता है बल्कि चिकित्सक के भीतर मरीजों के साथ लगाव के स्तर को बढ़ाया जा सकता है और इससे मरीज केंद्रित देखभाल में वृद्धि हो सकती है।
अध्ययन के लेखकों ने कहा है कि लगभग 60 प्रतिशत चिकित्सकों में गुस्से के लक्षण पाए जाते हैं। इसे भावनात्मक थकान, मरीज के साथ एक वस्तु जैसा व्यवहार करने और अपने काम की निम्न समझ के रूप में लिया जाता है।
युनिवर्सिटी ऑफ रोचेस्टर मेडिकल सेंटर (यूआरएमसी) में नैदानिक चिकित्सा के सह प्राध्यापक माइकल एस.क्रैसनर के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन कहता है कि इस प्रशिक्षण के जरिए किसी चिकित्सक के भीतर मरीजों के साथ लगाव के स्तर को बढ़ाया जा सकता है और इससे मरीज केंद्रित देखभाल में वृद्धि हो सकती है।
क्रैसनर ने कहा है, "मरीज के परिप्रेक्ष्य में हम अक्सर यह सुनते आए हैं कि मरीज अपने चिकित्सक के व्यवहार से असंतुष्ट होता है। चिकित्सक के परिप्रेक्ष्य में हमें सुनने को मिलता है कि चिकित्सा पेशे की तनावपूर्ण, जटिल व अव्यवस्थित वास्तविकता के कारण चिकित्सकों को मरीजों के साथ गहरे जुड़ाव का मौका नहीं मिल पाता।"
क्रैसनर ने कहा है, "चिकित्सकों में अपने सहयोगियों के साथ समझदारीपूर्ण संवाद के गुण विकसित कर उनके भीतर एकाकीपन की भावना को समाप्त किया जा सकता है।"
इन निष्कर्षो को जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन में प्रकाशित किया गया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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