मंदाकिनी में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन रोकने के लिए शुरू हुआ अभियान

चित्रकूट, 23 सितंबर(आईएएनएस)। चित्रकूट धाम की जीवनदायिनी मंदाकिनी नदी में देवी प्रतिमाओं का विसर्जन रोकने के लिए गायत्री परिवार की अगुवाई में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एक जनजागरण अभियान शुरू किया है। इसके तहत देवी पूजा पंडालों के संचालकों को देवी प्रतिमाएं भूमि में विसर्जन के लिए राजी किया जा रहा है।

इस अभियान से जुड़े लोग नवरात्र शुरू होने के दिन से ही मंदाकिनी को निर्मल बनाने के लिये जनजागरण कर रहे हैं। वे पूरे जिले के देवी पंडालों में पहुंचकर आयोजकों को समझ्झा रहे हैं कि प्रतिमाओं का विसर्जन मंदाकिनी नदी में करने के बजाए उनका भू-विर्सजन किया जाए, जिससे कि नदी के पवित्र जल में रासायनिक पदार्थो (केमिकल) और मिट्टी को जाने से रोका जा सके।

इस अभियान के प्रमुख एवं चित्रकूट स्थित गायत्री शक्ति पीठ के व्यवस्थापक डॉ. रामनारायण त्रिपाठी ने बुधवार को आईएएनएस से कहा, " चूंकि यह धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला है, इसलिए हमने पहले धमोचार्यो की सहमति ली है। उनकी सहमति लेने के बाद हमने मंदाकिनी को बचाने के लिए यह अभियान शुरू किया।"

त्रिपाठी ने कहा कि अगर आयोजक भू-विसर्जन करने के लिए राजी हो जाते हैं तो हम जनसेवी संस्थानों और प्रशासन की मदद से मंदाकिनी नदी के किनारे बड़े गड्ढे करवाकर वैदिक रीति से देवी प्रतिमाओं का विसर्जन कराएंगे। इसके अलावा एक विकल्प यह भी है कि आयोजक अपने कस्बे के आस-पास के तालाबों के किनारे भी गड्ढे खोदकर देवी प्रतिमाओं का विसर्जन कर सकते हैं।

चित्रकूट में हर साल नवरात्रि पर देवी प्रतिमाओं के करीब 400 पंडाल लगते हैं और नवरात्रि का समापन होने पर सभी का विसर्जन मंदाकिनी नदी में किया जाता है।

इस अभियान से जुड़े समाजसेवी आलोक द्विवेदी ने कहा कि जनजागरण के माध्यम से अगर हमने 200 मूर्तियों को भी इस साल मंदाकिनी में विसर्जित होने से बचा लिया तो यह हमारे लिए बड़ी उपलब्धि होगी। आज एक प्रचलन के तहत ही लोग देवी प्रतिमाओं को नदियों में विसर्जित करते हैं। उन्हें भरोसा है कि धीरे-धीरे भू-विसर्जन का प्रचलन भी बन जाएगा। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में तो प्रशासन प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए तालाबों का अलग से निर्माण करता है।

महाकाली दुर्गा पूजा समिति के श्रीराम केसरवानी ने कहा भू-विसर्जन को तो धर्माचार्यो ने वैदिक रीति से सही करार दिया है, तो विकल्प के रूप में देवी प्रतिमाओं का भू-विर्सजन अब समय की मांग के अनुसार अपनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि हमें समझना होगा कि आज नदियां सूख रही हैं। ऐसे में हम उनमें कम से कम बाहरी चाजें डालें। आज समूचे विश्व में जल का संकट सामने आ चुका है और इस तरह से नदियों में पूजा सामग्री व मूर्तियां डालने से तो वे पट जाएंगी फिर पीने का पानी कहां से आएगा।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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