नेपाल में सामाजिक क्रांति की मिसाल है दलित पुजारिन
नेपाली में धार्मिक क्षेत्र में महिलाओं और खासकर दलितों की दयनीय स्थिति जगजाहिर है, पर सुकमाया इसका अपवाद बन चुकी है। राजधानी के बनेश्वर इलाके के इस मंदिर में देव प्रतिमाओं की पूजा अर्चना एवं देखभाल की जिम्मेवारी इस दलित महिला पर है। चार बच्चों की मांग सुकमाया अछूत समझे जाने वाली सरकी जाति से है। कभी इस जाति के लोग मृत मवेशियों का मांस खाकर पेट की आग बुझाने को बाध्य थे।
यह वही सुकमाया है जिसे कसकी जिले में अपने गांव के मंदिर में प्रवेश की इजाजत नहीं थी। वह कहती हैं, "गांव के मंदिर में मेरे परिवार के लोगों को प्रवेश की इजाजत नहीं थी। किसी भी सामाजिक या धार्मिक समारोह में हमें भाग लेने की इजाजत नहीं थी। शादी के बाद जब मैं काठमांडू आई तो मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि मेरी सास चौकी रोकाया को चक्कू बक्कू मंदिर में काम करने की इजाजत मिली हुई है। मैंने भी मंदिर से जुड़ने का मन बना लिया।"
सुकमाया इस मंदिर में सास की जगह काम करने लगी और उसकी प्रतिबद्धता से मंदिर संरक्षण समिति के प्रमुख श्याम प्रसाद अरयाल इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे मंदिर की पुजारिन बना दिया।
जाति से ब्राह्मण अरयाल कहते हैं, "इस महिला की प्रतिबद्धता से मैं अभिभूत हूं। मैं समझता हूं कि वह कई ब्राह्मणों से बेहतर है। मैं ऐसे कई सवर्णो को जानता हूं तो घृणित कार्य करते हैं, पर समाज की नजर में सवर्ण ही बने हुए हैं। इस महिला का आचरण दूसरों के लिए मिसाल है। फिर, ईश्वर की सेवा वह क्यों नहीं कर सकती?"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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