तुष्टिकरण एवं अस्थायी शांति की नीति से नहीं मिटेगा नक्सलवाद : मारवाह
नई दिल्ली, 22 सितम्बर (आईएएनएस)। भारत में नक्सलवाद की मुख्य वजह सामाजिक एवं आर्थिक अन्याय है, पर इसके आधार पर हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता। तुष्टिकरण एवं अस्थायी शांति की नीति से किसी भी सूरत में नक्सलवाद का हल नहीं निकलेगा। सुरक्षा विश्लेषक वेद मारवाह ने अपनी नई पुस्तक में यह राय प्रकट की है।
मारवाह इसमें लिखते हैं कि इस मामले में दृढ़ निश्चय की कमी और तदर्थवादी सोच समस्या की जड़ है। "इंडिया इन टरमॉयल : जम्मू एंड कश्मीर, नॉर्थईस्ट एवं लेफ्ट एक्सट्रीमिज्म" नामक इस पुस्तक में आतंकवाद के चिंताजनक परिदृश्य का आकलन किया गया है।
देश में नक्सलवाद के बारे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस राय से वह सहमत हैं कि नक्सलवादी हिंसा देश के लिए बड़ी चुनौती है। वह इस पुस्तक में लिखते हैं, "नक्सलवाद भारत की सुरक्षा के लिए आज सबसे बड़ा खतरा है। अस्थायी शांति के लिए प्रयास किए जाने की नीति का नुकसान देश को भुगतान पड़ रहा है। इसका दीर्घकालीन असर पड़ेगा। "
उन्होंने लिखा है, "भ्रष्ट एवं अक्षम प्रशासन से किसी करामात की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? जब तक मौलिक राजनीतिक एवं आर्थिक सुधार नहीं किए जाते, आर्थिक एवं सामाजिक नाइंसाफी का हल नहीं निकल सकता।"
सोमवार को रिलीज हुई इस किताब में देश की आंतरिक सुरक्षा के हालात का आकलन किया गया है। इसमें उन्होंने सरकार में उच्च स्तर पर होने वाले सुरक्षा संबंधी फैसले की प्रक्रिया का भी जिक्र किया है। इसमें आतंकवाद के संदर्भ में प्रशासनिक एवं राजनीतिक प्रणाली की खामियों का जिक्र किया गया है।
मणिपुर एवं झारखंड के राज्यपाल रह चुके मारवाह का मानना है कि जब तक इस समस्या से निपटने के लिए व्यापक ठोस रणनीति नहीं बनाई जाती, इसका समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए वह शांति प्रक्रिया एवं विकास दोनों को तवज्जो दिए जाने की वकालत करते है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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