मिग-21 को हटाने से लड़ाकू विमानों की कमी की आशंका
रितु शर्मा
नई दिल्ली, 19 सितम्बर (आईएएनएस)। आधुनिक जेट विमानों के मिलने में हो रही देरी के कारण वायुसेना खराब सुरक्षा रिकार्ड के बावजूद मिग-21 विमानों को अपने बेड़े से चरणबद्ध ढंग से हटाने की अनिच्छुक है।
बारंबार होने वाली दुर्घटनाओं के कारण "उड़न ताबूत" का नाम पाने वाले 450 से अधिक एकल इंजन वाले मिग-21 विमानों में से वायुसेना की सेवा में अब केवल 150 से 160 विमान बचे हैं। शांतिकाल की दुर्घटनाओं के कारण वायुसेना ने भारी संख्या में विमान गवाएं हैं।
स्वयं मिग-21 उड़ा चुके वायुसेना के एक शीर्ष अधिकारी ने आईएएनएस को बताया कि बहुत पुराना होना और इनकी नियंत्रण प्रणाली अप्रचलित हो जाना मिग-21 विमानों की प्रमुख समस्या है।
परंतु लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रही वायुसेना मिग-21 विमानों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की स्थिति में नहीं है। इससे उसकी ताकत में कमी होगी।
दुनिया की चौथी सबसे बड़ी वायुसेना के पास स्वीकृत 39 स्क्वाड्रनों के स्थान पर 33.5 स्क्वाड्रन हैं।
वायुसेना के एक अन्य कमांडर ने कहा कि हमारे पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की कमी है। स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान (एलएसी) और बहुउद्देश्यीय मध्यम लड़ाकू विमान (एमएमआरसीए) के मिलने में विलंब से मिग-21 विमानों को हटाने की तय सीमा और बढ़ सकती है।
भारत सरकार ने 126 एमएमआरसीए की खरीद के लिए अंतर्राष्ट्रीय निविदा जारी की है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार निविदा जमा करने, तकनीकी मूल्यांकन और मैदानी परीक्षणों की प्रक्रिया में लगने वाले समय के कारण पहला विमान वर्ष 2020 में ही वायुसेना को हासिल हो पाएगा।
यह अंदाजा लगाया गया है कि मिग-21 के पांच स्क्वाड्रनों को हटा देने से अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ भारत की परंपरागत बढ़त खत्म हो जाएगी।
मिग-21 विमानों को हटाने की वर्तमान समय सीमा 2011 तक है लेकिन खरीद और स्वदेशी विमान निर्माण में विलंब से यह समय सीमा और टल सकती है।
वायुसेना ने वर्ष 1993 के बाद से 260 विमान गंवाएं हैं, इनमें 107 मिग-21 विमान थे। पिछले पांच वर्षो में 50 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए हैं।
पहला मिग-21 विमान वर्ष 1964 में वायुसेना में शामिल किया गया था। इसके बाद से वायुसेना ने 450 मिग-21 विमानों का बेड़ा तैयार किया। इन विमानों ने वर्ष 1971 के पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध और वर्ष 1999 के कारगिल संघर्ष में अपनी क्षमता सिद्ध की।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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