एक साल में बदल गई दुनिया

एक साल में बदल गई दुनिया

निवेश बैंक लीमन ब्रदर्स को दिवालिया हुए एक साल हो गया है और ये वही घटना थी जिसने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट के शुरुआत का संकेत दिया था. पिछले 12 महीनों में वित्तीय पटल पूरी तरह बदल गया है.

वॉल स्ट्रीट की कई संस्थाएँ इस दौरान ध्वस्त हो गईं तो सरकारों को बैंकों को बचाने के लिए अभूतपूर्व स्तर पर क़दम उठाने पड़े.

ब्याज दर कम की गईं और कुछ मामलों में तो वो लगभग शून्य तक पहुँच गई और सरकारों ने बड़े पैमाने पर अर्थव्यवस्था में धन लगाना शुरू किया.

अब लीमन ब्रदर्स से जुड़े मसलों को देख रहे प्रमुख अधिकारी टोनी लोमास का कहना है कि उससे जुड़े वैधानिक विवादों को सुलझाने में 10 साल तक का समय लग सकता है.

कई लोगों को एक साल पहले उम्मीद थी कि लीमन ब्रदर्स को बचा लिया जाएगा मगर ऐसा नहीं हुआ.

इस बात के संकेत तो मिल रहे हैं कि अर्थव्यवस्था मंदी से उबर रही है मगर ये कब तक क़ायम रहेगा इसका कोई अंदाज़ा नहीं है.

विश्वास हिला

लीमन ब्रदर्स के दिवालिया होने की वजह से दुनिया भर के वित्त बाज़ारों का विश्वास हिल गया था. ख़ास तौर पर निवेशकों का ऐसे उत्पादों पर से विश्वास हट गया जिनका नियामन करने वाली कोई संस्था नहीं थी.

घरों के लिए दिए गए ऋणों की वजह से परेशानियाँ शुरू हुईं जिनकी क़ीमतें लगातार गिरती गईं. वैसे संकट के 12 महीने बाद भी अधिकतर बैंक अब भी बाज़ार में हैं हालाँकि अधिकतर की हालत ख़राब है.

बैंकों और निवेश फ़ंडों ने लीमन ब्रदर्स की अधिकतर संपत्तियों का आकलन किया और उन्हें व्यर्थ का बताया.

किसी को पता नहीं कि इस पूरी प्रक्रिया में कितने पैसे का नुकस़ान हो गया. वैसे अनुमान दस खरब डॉलर से लेकर तीस खरब डॉलर के बीच तक लगाया जाता है.

इन आँकड़ों को कुछ यूँ समझिए कि दस खरब डॉलर का मतलब हुआ कि भारत में जो भी उत्पादन होता है उसकी एक साल की पूरी क़ीमत जबकि तीस खरब डॉलर का मतलब हुआ कि फ़्रांस या ब्रिटेन की पूरी की पूरी अर्थव्यवस्था.

अन्य कारक

निश्चित क़ीमत का तो शायद कभी पता चल ही नहीं सके मगर अब ध्यान इस चीज़ पर दिया जा रहा है कि अभी और कौन सी ऐसी समस्याएँ हैं जिनका समय रहते पता नहीं चल सका.

इनमें से एक 'डार्क पूल ट्रेडिंग' हो सकता है, ये ऐसे लेन देन हैं जो मुख्य शेयर बाज़ार से अलग होते हैं और इनकी क़ीमत बाद तक सार्वजनिक नहीं की जाती.

अब अमरीका में नियामक देख रहे हैं कि क्या डार्क ट्रेड पूलिंग अब शेयर बाज़ार को अस्थिर कर सकता है.

इसके अलावा कुछ अन्य ख़तरे भी हो सकते हैं. वैसे तो लीमन के दिवालिया होने के बाद नियामकों ने व्यापार के कई पहलुओं पर नज़र रखी है मगर बाज़ार में नई-नई चीज़ें सामने आती रहती हैं. इसलिए पिछले साल जैसा संकट शायद दोबारा तो नहीं आएगा मगर चिंता ये है कि भविष्य में बाज़ार में कुछ नई तरह की परेशानी सामने आ सकती है और उसके लिए अभी से कुछ एहतियात बरतने की कोशिश की जा रही है.

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