लोग सरकारी नियंत्रण के पक्ष में: बीबीसी
वैश्विक वित्तीय संकट के एक साल पूरा होने पर बीबीसी ने दुनिया के 20 प्रमुख देशों में कराए एक सर्वेक्षण में पाया है कि अधिकतर लोग चाहते हैं कि सरकारें अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखने और इसे प्रोत्साहन देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएँ.
बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए ग्लोबस्कैन और अमरीका स्थित प्रोग्राम ऑन इंटरनेशनल पॉलिसी एटिट्यूड्स (पीआईपीए) ने 20 प्रमुख देशों में 22158 लोगों से बातचीत कर इस साल 19 जून और 17 अगस्त के बीच सर्वेक्षण कराया.
सर्वेक्षण में पाया गया कि इन देशों में औसतन 60 प्रतिशत लोग और 20 में से 13 देशों में बहुमत का ये मानना है सरकारें अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन देने के लिए ख़र्च बढ़ाएँ. सर्वेक्षण के अनुसार 67 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि सरकारें अर्थव्यवस्था पर अपना नियंत्रण भी बढ़ाएँ.
सर्वेक्षण में भाग लेने वाले चीन के 94 प्रतिशत, नाइजेरिया के 87 प्रतिशत, मिस्र के 83 प्रतिशत और रूस के 81 प्रतिशत लोग सरकारी नियंत्रण बढ़ाए जाने से सहमत हैं. उधर फ़्रांस में केवल 39 प्रतिशत और जर्मनी में 42 प्रतिशत लोग आर्थिक जगत को सरकारी प्रोत्साहन दिए जाने के हक़ में हैं.
इसके अलावा 67 प्रतिशत लोग मंदी की चपेट में आए उद्योगों और कंपनियों को आर्थिक मदद देने का समर्थन करते हैं, जबकि 72 प्रतिशत लोग अक्षय ऊर्जा के लिए किए गए निवेश के पक्षधर हैं.
लेकिन अपनी सरकार की कारगुज़ारी के बारे में हर देश में लोगों का मत अलग-अलग है. लेकिन कुल-मिलाकर देखा जाए तो औसतन 44 प्रतिशत लोग अपनी-अपनी सरकारों की कारगुज़ारी से संतुष्ट हैं, 36 प्रतिशत विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मद्रा कोष की कार्रवाई से संतुष्ट हैं और केवल 32 प्रतिशत प्रमुख बैंकों के अधिकारियों से और 31 प्रतिशत चीन से संतुष्ट हैं.
ऑस्ट्रेलिया में 68 प्रतिशत, मिस्र में 63 प्रतिशत, ब्राज़ील में 59 प्रतिशत, कनाडा और इंडोनेसिया में 57 प्रतिशत लोग अपनी सरकारे के उठाए गए क़दमों से संतुष्ट हैं.
उधर वित्तीय संकट के दौर में भारतीय नेताओं के कामकाज से 47 प्रतिशत लोग संतुष्ट हैं. सर्वेक्षण के मुताबिक 45 प्रतिशत भारतीय मानते हैं कि आर्थिक विकास के बोझ सभी लोगों को एक जैसे ही झेलने पड़े हैं और इसके लाभ भी सभी को एक जैसे ही मिल रहे हैं.
ग्लोबस्कैन के चेयरमैन डौग मिलर का कहना है, "ये स्पष्ट है कि अब भी अनेक देशों के नागरिक अपने-अपने देश की सरकार से उस तरह का आर्थिक नेतृत्व नहीं देख रहे जिसकी ज़रूरत है. विशेष तौर पर यूरोप, जापान, लातिनी अमरीका में लोग कम संतुष्ट हैं और ऐसा प्रतीत होता है कि विश्व में उन क्षेत्रों में उपभोक्ता में विश्वास पैदा होने में देर लगेगी और ये आर्थिक स्थिति बेहतर होने के लिए ज़रूरी है."
सर्वेक्षण के मुताबिक कनाडा से सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 68 प्रतिशत सरकार के अर्थव्यवस्था में और पैसा डालने के समर्थक हैं जबकि 65 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण बढ़ाए.
सर्वेक्षण में भाग लेने वाले अमरीका के 48 प्रतिशत लोग इस पक्ष में हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था में और पैसा झोंके और 48 प्रतिशत ही इसके ख़िलाफ़ हैं. अमरीका में सरकार की कारगुज़ारी से 46 प्रतिशत संतुष्ट हैं. ग़ौरतलब है कि बैंकों के बचाव के लिए दिए जाने वाले पैकेज का 63 प्रतिशत लोग विरोध करते हैं जबकि औद्योगिक क्षेत्र को दी जाने वाली मदद का 55 प्रतिशत लोग विरोध करते हैं.
महत्वपूर्ण है कि 50 प्रतिशत अमरीकी अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रण बढ़ाने के पक्षधर हैं और 52 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय वित्तीय और नियामक संस्थाओं को और अधिकार दिए जाने का विरोध करते हैं.
यूरोप में फ़्रांस में 51 प्रतिशत का मानना है सरकार को आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज बढ़ाने की ज़रूरत नहीं है जबकि 76 प्रतिशत मंदी की चपेट में आए बड़े उद्योगों को मदद देने के पक्ष में हैं. लेकिन 62 प्रतिशत लोग बैंकों को मदद दिए जाने का विरोध करते हैं.
उधर जर्मनी में 74 प्रतिशत लोग सरकार की ओर से बैंकों को मदद देने का विरोध करते हैं. इसी के साथ 53 प्रतिशत सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था में और पैसा डालने का विरोध करते हैं.
रूस में 81 प्रतिशत लोग सरकार के अर्थव्यवस्था में पैसा झोंकने के पक्ष में हैं. ब्रिटेन में 55 प्रतिशत लोग सरकारी नियंत्रण के पक्ष में हैं जबकि 60 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकार अर्थव्यवस्था में और पैसा झोंके.
ऑस्ट्रेलिया में 73 प्रतिशत लोग सरकार की ओर से अर्थव्यवस्था में ज़्यादा ख़र्च के पक्षधर हैं जबकि 67 प्रतिशत चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था का सरकारी नियंत्रण बढ़े.
चीन में 62 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकार प्रोत्साहन पैकेज बढ़ाए जबकि 94 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकारी नियंत्रण बढ़ना चाहिए.
जापान से सर्वेक्षण में भाग लेने वाले 47 प्रतिशत चाहते हैं कि सरकार आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज बढ़ाए जबकि 38 प्रतिशत चाहते हैं कि अर्थव्यवस्था का सरकारी नियंत्रण बढ़ना चाहिए जबकि 37 प्रतिशत इसके ख़िलाफ़ हैं.


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