अमेरिका ने दी हॉकआई ई-2डी बेचने की अनुमति
नई दिल्ली, 13 सितम्बर (आईएएनएस)। अमेरिकी सरकार ने भारत को उच्च प्रौद्योगिकी 'एयरबोर्न अर्ली वार्निग सिस्टम (एईडब्ल्यू)' से युक्त हॉकआई ई-2डी विमान बेचने का रास्ता साफ कर दिया है। यह लड़ाकू विमान विमानवाहक पोत पर तैनात होगा।
सूत्रों के अनुसार अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की सफल भारत यात्रा और 'एंड यूजर मॉनीटरिंग एग्रीमेंट' (ईयूएमए) पर हस्ताक्षर के कारण यह सफलता हासिल हुई है।
'पी 8' समुद्री बहुउपयोगी विमानों के समान ही हॉकआई ई-2डी नवीनतम प्रौद्योगिकी है और अभी अमेरिकी नौसेना को भी यह विमान उपलब्ध कराया जाना बाकी है।
भारतीय नौसेना ने पहले से ही आठ बोइंग पी8 विमानों की खरीद का आदेश दिया है।
यूएई के बाद भारत दूसरा ऐसा देश है जिसे इस उन्नत प्रौद्योगिकी को बेचने की इजाजत अमेरिकी विदेश और रक्षा विभाग ने दी है। अमेरिकी नौसेना ने इस विमान के परीक्षण के लिए 43.2 करोड़ डॉलर की रकम स्वीकृत की है। मैरीलैंड के पेटुजेंट रिवर नेवल एयर स्टेशन पर इसका परीक्षण जारी है।
हॉकआई ई-2डी का निर्माण नार्थरोप ग्रुम्मैन विमान कंपनी ने किया है, जो लड़ाकू विमान, युद्धपोत, मिसाइल, लड़ाकू रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम बनाने वाली बड़ी कंपनी है।
कंपनी के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार विकास कार्यक्रम के प्रबंधक टॉम सी.टड्रेल ने इंडिया स्ट्रेटेजिक मैगजीन को बताया कि इस विमान का अगस्त में भारतीय नौसेना के सामने प्रदर्शन किया गया था।
परंतु भारतीय नौसेना अधिकारियों के सामने हॉकआई ई-2सी का प्रदर्शन किया गया था जो अमेरिकी नौसेना कई वर्षो से उपयोग कर रही है।
भारतीय नौसेना ने विमान को भविष्य में लंबे समय तक उपयोग करने के मद्देनजर हाकआई ई-2डी ही खरीदने का फैसला किया।
इंडियन स्ट्रेटेजिक मैगजीन ने भारतीय अधिकारी के हवाले से लिखा है कि हॉकआई ई-2डी की तकनीकी खूबिया काफी आकर्षक हैं और गोर्शकोव तथा भारत का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत भी इस विमान को तैनात करने के योग्य नहीं हैं। भारत के भविष्य के विमानवाहक पोत कुछ बड़े हो सकते हैं।
आने वाले वर्षो में यह विमान तटीय हवाई अड्डों से ही उड़ान भरेगा और भविष्य में जिन दो अन्य विमानवाहक पोतों की योजना है, ये विमान उन पर तैनात किए जा सकते हैं।
गोर्शकोव पर तैनात करने के लिए खरीदे जा रहे मिग-29 विमानों से हाकआई ई-2डी आकार में बड़ा है।
अमेरिकी नौसेना को हाकआई ई-2डी वर्ष 2011 के अंत तक मिलेगा और भारत को समझौते पर हस्ताक्षर होने के तीन वर्ष के बाद यह उपलब्ध होगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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