'तिंग्या' ने बदला बाल कलाकार शरद का जीवन
मुंबई, 11 सितम्बर (आईएएनएस)। पहाड़ी जंगलों में पलने-बढ़ने से लेकर फिल्म 'तिंग्या' में अभिनय तक का सफर तय कर चुके राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता 11 वर्षीय अभिनेता शरद गोयकर की जीवन यात्रा अब एकदम बदल गई है। उसने महाराष्ट्र के सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में से एक में दाखिला ले लिया है।
पुणे से 100 किलोमीटर दूर स्थित राजुरी गांव में पैदा और बड़े हुए एक देहाती लड़के शरद की अब तक की जीवन यात्रा परियों की कहानी की तरह है।
खानाबदोश जिप्सी जाति का गोयकर परिवार अपने तीन घोड़ों, करीब 150 बकरियों और भेड़ों और कुछ मुर्गियों के साथ राजुरी से चार किलोमीटर दूर स्थित 30-35 परिवारों के एक छोटे से गांव में रहता है।
फिल्म 'तिंग्या' के निर्देशक मंगेश हडावले के मुताबिक, "यह जगह तेंदुए, सांप, बिच्छू और अन्य वन्य प्राणियों से भरी हुई है। शरद इन्हीं के बीच घने जंगलों में पशुओं को चराते हुए बड़ा हुआ है।"
29 वर्षीय हडावले के निर्देशन में बनी फिल्म 'तिंग्या' के लिए शरद को इसी सप्ताह राष्ट्रीय पुरस्कारों में श्रेष्ठ बाल कलाकार का सम्मान मिला है। हडावले द्वारा लिखित यह एक अर्ध-आत्मकथात्मक फिल्म है।
2007 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'तिंग्या' सात साल के एक बच्चे की कहानी है। वह परिवार के कर्ज के चलते मारे जा रहे अपने घायल और विकलांग बैलों को कसाई के चाकू से बचाने की असफल कोशिश करता है। बैलों की बलि के बाद उसके यहां एक गाय एक मादा बछड़े को जन्म देती है। तिंग्या उससे एक बैल जैसा व्यवहार करता है और जीवन चलता रहता है..
इस वास्तविक और दिल को छूने वाली फिल्म को करीब चार दर्जन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं।
हडावले ने आईएएनएस से कहा, "दो साल पहले पूना में मिलने वाले पहले बड़े सम्मान को लेने के लिए हमने उसे बड़ी कठिनाई से मंच पर जाने को राजी किया था।"
सम्मान समारोह में पूना का एक शैक्षिक परिवार भी उपस्थित था। इस परिवार ने शरद को गोद लेने की इच्छा जताई थी। बस तभी से शरद की जिंदगी बदल गई। वह 70 प्रतिशत अंकों के साथ पांचवी कक्षा उत्तीर्ण कर चुका है और अब छठी कक्षा में है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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