प्राचीन काल में गया में थी 365 पिंडवेदियां
मान्यता है कि पितृपक्ष के पूरे 15 दिनों तक इन 45 वेदियों पर पिंडदान करना श्रेयस्कर होता है लेकिन कई लोग समयाभाव या अज्ञानतावश मात्र त्रिदिवसीय, एक दिवसीय या जितने दिनों में पिंडदान कर सके उतने दिनों तक श्राद्घ-पिंडदान कर विदा ले लेते हैं। इतने कम समय में गयापाल पुरोहितों द्वारा फल्गु, विष्णुपद, प्रेतशिला, धर्मारण्य और अक्षयवट वेदियों पर पिंडदान करवाकर सुफल (आशीष) दे देते हैं।
अखिल भारतीय विद्वत परिषद के मगध प्रमंडल के अध्यक्ष आचार्य लाल भूषण मिश्र ने आईएएनएस को बताया कि गया में 365 वेदियों का उल्लेख कई पुस्तकों में है। उन्होंने दावा किया कि इनमें से 55 वेदियों की खोज कर ली गई है तथा अन्य वेदियों की खोज जारी है। उनका कहना है कि आज भी कुछ वेदियां हैं लेकिन अतिक्रमण या प्राचीन हो जाने के कारण इन पर पिंडदान बंद हो गया है।
मिश्र ने कहा कि मधुकुल्य, धृतकुल्य, तथा कोटिश्वर महादेव वेदियां आज भी नजर आती हैं लेकिन इन पर पिंडदान नहीं किया जाता। उन्होंने बताया कि गया में तीन प्रकार की वेदियां दर्शन वेदी, तर्पण वेदी तथा पिंड वेदियां हैं। दर्शन वेदियों का दर्शन किया जाता है, जबकि तर्पण वेदियों पर तर्पण और पिंड वेदियों पर पिंड दिया जाता है।
शोधकर्ता ललिता प्रसाद विद्यार्थी ने अपनी पुस्तक 'उत्तर भारत का एक सांस्कृतिक नगर : गया' में भी 365 वेदियों का जिक्र किया गया है। पुस्तक में कहा गया है कि गया में कलांतर में ये वेदियां विलुप्त होती गईं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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