माया के स्मारक निर्माण पर रोक

अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा को यह कहते हुए आड़े हाथों लिया कि उन्होंने 27 फरवरी को सर्वोच्च न्यायालय को यह क्यों नहीं बताया कि सरकार ने लखनऊ में विभिन्न संपत्तियों और इमारतों को पहले ही ध्वस्त कर दिया था।
करदाताओं के पैसे की बर्बादी
खंडपीठ, लखनऊ निवासी मिथिलेश कुमार सिंह की उस याचिका की सुनवाई कर रही थी, जिसमें लखनऊ में 20 अरब रुपये की लागत से बनाए जा रहे स्मारक को चुनौती दी गई है। खंडपीठ ने इसे बार-बार करदाताओं के पैसे की बर्बादी करार दिया।
सिंह की ओर से अदालत में पेश होते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत से कहा कि चूंकि उत्तर प्रदेश सरकार विभिन्न कानूनी याचिकाओं के रूप में राज्य में अपने निर्माण अभियान के गंभीर विरोध का सामना कर रही है, इसलिए उसने उन कानूनी याचिकाओं को यहां स्थानांतरित कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। कानूनी याचिकाओं के लंबित होने के बावजूद सरकार निर्माण कार्य को जारी रखे हुए है।
अगली सुनवाई 29 को
खंडपीठ ने मिश्रा के बहस से इस बात की जानकारी मिलने के बाद उन्हें खासतौर से आड़े हाथों लिया कि जब अदालत ने 27 फरवरी को संपत्तियों के ढहाए जाने पर रोक लगाने का आदेश दिया था, राज्य सरकार उसके पहले ही भवनों के ढहाने का काम पूरा कर चुकी थी।
खंडपीठ ने कहा, "अदालत को यह क्यों नहीं बताया गया कि कानूनी याचिका में दर्ज सभी इमारतों और संपत्तियों को पहले ही ढहाया जा चुका है? अदालत को यह क्यों नहीं बताया गया कि वह 27 फरवरी 2009 को एक व्यर्थ का आदेश पारित कर रही थी?" इस मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।












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