'हम कभी द्रौपदी हैं, कभी दुर्योधन'

'हम कभी द्रौपदी हैं, कभी दुर्योधन'

अतुल संगर

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

लेखक और आर्थिक मामलों के जानकार गुरचरण दास वैश्विक आर्थिक मंदी के एक साल बाद भी मानते हैं कि भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के विकास के लिए उदारीकरण ही सही नीति है. वे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय हुए बैंकों के राष्ट्रीयकरण को ग़लत मानते हैं. उनका मानना है कि ग़रीबों की मदद करनी है तो उनके लिए चलाई जा रही तीन दर्जन योजनाएँ बंद होनी चाहिए और उनकी पहचान करने के बाद उनके बैंक खातों में सीधे पैसा भेजा जाना चाहिए.

बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में ये विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने अपनी नई किताब ‘डिफ़िकल्टी ऑफ़ बीईंग गुड’ का हवाला दिया और समाज-अर्थव्यवस्था के साथ-साथ नैतिक मूल्यों पर भी चर्चा की है.

प्रस्तुत हैं उनके साथ विशेष बातचीत के मुख्य अंश:

प्रश्न : आपने अपनी नई किताब ‘द डिफ़िकल्टी ऑफ़ बीईंग गुड’ में आज के समाज, अर्थव्यवस्था और राजनीति को महाभारत के ज़रिए समझने की बात की है. लेकिन सदियों पुराना महाभारत, आज की जटिल समस्यों पर क्या बता सकता है?

उत्तर : आज यदि सरकारों की कारगुज़ारी देखें तो बहुत दुःख होता है. भ्रष्टाचार हर स्तर पर व्याप्त है. महाभारत में मैं ये नहीं खोज रहा था कि ऐसी कोई दस चीज़ें मिल जाएँ जिन्हें करने से सब ठीक हो जाए.

आज की ही बात करें... अंबानी भाइयों में युद्ध हो रहा है....दुर्योधन बर्दाश्त नहीं कर सकता था कि पांडव जीत जाएँ – इर्ष्या थी – इस द्वंद्व में ही महाभारत की झलक मिल जाती है. मुकेश को ही लीजिए....मुकेश ने अनिल को उसका हिस्सा नहीं दिया था, वो तो लड़ने के बाद ही अनिल को मिला...

यदि सत्यम की बात करें तो ये केवल कॉरेपोरेट लोभ नहीं है. रामालिंगमराजू का हिस्सा सत्यम में केवल 8.5 प्रतिशत रह गया था और संभव था कि उनके लड़के भविष्य में कंपनी के मुख्य कार्यकारी न बनते. उन्होंने सत्यम का पैसा मेटास कंपनी में लगाया. ये धृतराष्ट्र वाली कमी है – औलाद का मोह.

प्रश्न : तो फिर आज की आर्थिक मंदी के दौर में अर्थव्यवस्था और समाज में पांडव, कौरव कौन हैं और कृष्ण कौन है?

उत्तर : हम हैं महाभारत...किसी दिन हम द्रौपदी बन जाते हैं, किसी दिन दुर्योधन बन जाते है. हर व्यक्ति के अनेक रुप होते हैं. ज़रुरी नहीं कि ये पूरी तरह बुरा या पूरी तरह अच्छा ही हो, ज़्यादातर हर व्यक्ति इसका मिश्रण ही होता है.

प्रश्न : अनेक विश्लेषक मानते हैं आर्थिक मंदी के लिए पूँजीवाद ज़िम्मेदार है क्योंकि इसमें लोभ निहित है. आपकी राय.

उत्तर : ये जो आर्थिक संकट सामने आया है, उसमें अनेक लोगों ने ग़लतियाँ की हैं. नियामक संस्थाओं ने, निवेशक बैंकों ने और आम लोगों ने भी ग़लतियाँ की थीं. जिस अधिकारी ने कर्ज़ पर हस्ताक्षर किए....बैंकर जिसने ऐसे आदमी को कर्ज़ दिया जो लौटा नहीं सकता था और वह व्यक्ति जिसने कर्ज़ लिया, ये जानते हुए कि वह उसे नहीं लौटा सकता.

प्रश्न : यदि किसी और देश में किसी अन्य व्यक्ति या संस्थान की नैतिक ग़लतियों का ख़ामियाज़ा अन्य देशों में बैठे लोगों को भुगतना पड़े तो क्या ये पूँजीवाद और वैश्वीकरण दोष नहीं है?

उत्तर : मैं इससे सहमत नहीं हूँ. मैं समझता हूँ कि विशेष तौर पर भारत में, हमें और भी उदारीकरण और सुधार की नीति पर चलना होगा. केवल आर्थिक सुधार नहीं, पुलिस, न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षा सभी क्षेत्रों में सुधार लाने होंगे तभी विकास होगा. ये सही है कि वित्तीय क्षेत्र में कुछ कड़े नियम-क़ानून चाहिए, विशेष तौर पर अमरीका में जहाँ इनमें ख़ासी ढील दी गई है.

लेकिन हमें वो दिशा नहीं चाहिए जो भारत में 1991 से पहले थी, जिसे हम लाइसेंस राज कहते हैं. तब हमने उद्योगपतियों को कुचल ही दिया था. हमें ऐसी व्यवस्था चाहिए जो दुर्योधन जैसे लोगों को पकड़ ले, लेकिन टाटा या नारायणमूर्ति जैसे उद्योगपतियों को प्रोत्साहन दे.

प्रश्न : अनेक चिंतक मानते हैं कि भारतीय बैंक वित्तीय संकट से इसीलिए बचे रहे क्योंकि बैंकिग क्षेत्र में उदारीकरण नहीं हुआ था. संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी इसी मत की हैं. क्या आप सहमत हैं?

उत्तर : मेरा मानना है कि सरकार को बैंक नहीं चलाने चाहिए. सरकार का काम है प्रशासन दे. सरकार का काम ये नहीं है कि बैंक चलाए, हवाई जहाज़ चलाए या फिर स्कूल चलाए…राष्ट्रीयकरण…हम अब तक इसके परिणाम भुगत रहे हैं. जो देश प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहन देता है, वहीं संपन्नता आती है. जब सरकार बैंकों को चलाती है तो बैंक कर्मचारी नौकरशाह बन जाते हैं. उनकी सोच बन जाती है – मंत्री को ख़ुश करो, सचिव को ख़ुश करो...ग्राहक की परवाह हो या न हो..

सोनिया गांधी ने कहा था कि राष्ट्रीयकरण ने बचा दिया....ये ग़लत है. ये सही है कि बैंकिंग क्षेत्र उतना खुला नहीं था और उसका फ़ायदा मिला है. लेकिन सुधार दो-तीन साल के संकट के लिए नहीं होते, 100 साल के लिए होते हैं. यदि दो-तीन साल के लिए फ़ायदा हो भी गया, तो बाक़ी के सौ साल में क्या करोगे?

ज़रूरी है कि हम ये बैंक बेच दें. सरकार का भी फ़ायदा होगा, ग्राहकों का भी फ़ायदा होगा और देश का भी फ़ायदा होगा.

प्रश्न : भारत में जिस तरह से पूँजीवाद और उदारीकरण चल रहा है, क्या कभी आम आदमी को साथ लेकर विकास जिसे ‘इनक्लूसिव ग्रोथ’ कहा जा रहा है, संभव होगा?

उत्तर : विकास सभी तरह का अच्छा होता है. यह महज़ एक राजनीतिक नारा है कि इस तरह का विकास अच्छा है और उस तरह का विकास नहीं...जब विकास नहीं होता तो ग़रीबी फैल जाती है.

विश्व बैंक ने 80 देशों पर एक अध्ययन किया था - वर्ष 1940 से वर्ष 1990 तक. उसमें पाया गया कि जब एक देश बढ़ता है तो उसके सारे भाग बढ़ते हैं. यदि आप दो तीन साल की बात कर रहे हैं, तो किसी को ज़्यादा लाभ मिलेगा और किसी को कम....लेकिन यदि आप 10, 20 या 50 साल के विकास की बात करें तो ग़रीब वर्ग का भी वैसे ही विकास होगा जैसा अमीर वर्ग का..

यहाँ ये कहना ज़रूरी है इस सरकार ने ग़रीबों की मदद करने की कोशिश की है और राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़ग़ार योजना इसका अच्छा उदाहरण है.

ग़रीबों की मदद करनी चाहिए और ये हम सभी का फ़र्ज़ है....लेकिन ये हो कैसे. तकनीक ग़रीबों का सबसे अच्छा मित्र है. नंदन नीलेकनी की प्रॉजेक्ट के ज़रिए सबको एक नंबर मिलना चाहिए, एक बैंक खाता होना चाहिए...ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों की पहचान कर, बैंक के ज़रिए सीधा पैसा लोगों तक पहुँचाना चाहिए. राशन की व्यवस्था ग़लत है, इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है और बहुत सारा अनाज चूहे खा जाते हैं...ग़रीबों के लिए सरकार के लगभग तीन दर्जन प्रोग्राम हैं जिन्हें बंद कर देना चाहिए. ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे नागरिकों की पहचान कर, हर महीने सीधे उनके खाते में पैसे भेजे जाने चाहिए.

मेरी समझ से तो यह है तरीका उनकी मदद करने का..

जब हमारे स्कूल और प्राइमरी हेल्थ सेंटर अच्छी तरह से काम करेंगे, तब ग़रीबी हटेगी. क्या आपको पता है कि सरकार हर साल हर बच्चे की प्राइमरी शिक्षा पर 8000 रुपए ख़र्च करती है. ये पैसा बच्चों के माता-पिता को हर बच्चे के वज़ीफ़े के ज़रिए दे दो...ये केवल शिक्षा के लिए ही हो. उन्हें विकल्प मिल जाएगा और स्कूलों में शिक्षक आना शुरु कर देंगे क्योंकि उनका वेतन उस पर निर्भर करेगा.

प्रश्न : वैश्विक आर्थिक मंदी कब तक जारी रह सकती है और भारत उसके प्रभावों से कब तक बाहर निकल सकता है?

उत्तर : यह कहना मुश्किल है क्योंकि भविष्य को कौन जान पाया है. लेकिन डेढ़-दो साल तो आर्थिक मंदी का दौर चलेगा. लेकिन भारत इससे पहले मंदी से बाहर आ जाएगा. भारत की अर्थव्यवस्था के छह प्रतिशत विकास दर का जो ताज़ा आंकड़ा सामने आए हैं उससे ऐसे संकेत मिल रहे हैं.

लेकिन हमें तो आठ प्रतिशत की विकास दर चाहिए. वो दो प्रतिशत तभी आएगा जब निर्यात बढेंगी और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था भी बेहतर होगी.

इस दो प्रतिशत को छोटा सा आंकड़ा न मानें. इसका मतलब है कि हम 20 साल आगे आ सकते हैं, एक पूरी पीढ़ी को ग़रीबी से बाहर निकाला जा सकता है.

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