आर्थिक वृद्धि दर के धीमा पड़ने की आशंका : मुखर्जी
वित्तीय लेखकों के फोरम और राष्ट्रमंडल पत्रकार एसोसिएशन के सदस्यों से चर्चा के दौरान मुखर्जी ने कहा कि वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही में देश की अर्थव्यवस्था में सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में हासिल 6.1 प्रतिशत की विकास दर के संदर्भ में मुखर्जी ने कहा कि उन्हें अगली दो तिमाहियों में इस दर के कायम रहने के बारे में थोड़ा संदेह है।
इस चिंता के प्राथमिक कारण को गिनाते हुए मुखर्जी ने कहा कि औद्योगिक क्षेत्र के रफ्तार पकड़ने के बावजूद कृषि क्षेत्र की हालत खराब होने की आशंका है।
लंदन में जी20 के वित्त मंत्रियों की बैठक से तुरंत लौटने वाले वित्त मंत्री ने कहा कि जब तक यूरोपियन संघ की अर्थव्यवस्था में तेजी से सुधार नहीं होता तब तक निर्यातों में तेज वृद्धि की संभावना नहीं दिखाई देती।
उन्होंने कहा कि भारतीय निर्यातों का 60 प्रतिशत हिस्सा तीन अर्थव्यवस्थाओं यूरोपीय संघ, अमेरिका और जापान को जाता है। यूरोपीय संघ को 36 प्रतिशत, अमेरिका को करीब 15-16 प्रतिशत और जापान को करीब 14-15 प्रतिशत निर्यात होता है। तीनों ही देश गंभीर मंदी की चपेट में हैं।
लगातार 10 महीनों से भारतीय निर्यात में हो रही गिरावट से चिंतित मुखर्जी ने कहा कि वहां की अर्थव्यवस्थाओं में कोई तेज सुधार नहीं हुआ है। इसलिए निर्यात का बढ़ना बहुत कठिन है।
मुखर्जी ने कहा कि सूखे के कारण देश के 626 जिलों में से 252 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। इससे न केवल कृषि उत्पादन प्रभावित होगा वरन आगामी सत्र में पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ेगा।
उन्होंने कहा कि केंद्र के निरीक्षण वाले देश के 80 जलाशयों में पिछले वर्ष की तुलना में केवल 36 प्रतिशत पानी है।
इससे रबी के मौसम में फसलों को पानी की उपलब्धता प्रभावित होगी और कुछ जल विद्युत परियोजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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