पुजारियों की किल्लत से पितृ पक्ष अनुष्ठान पर पड़ सकता है असर
आगरा, 2 सितम्बर (आईएएनएस)। ऐसे में जब युवा पीढ़ी की पुजारी बनने में दिलचस्पी नहीं रह गई है, वैदिक रीति से हिंदू अनुष्ठान कराने वाले कुशल पंडितों की किल्लत हो गई है। इसका खास असर पांच सितंबर से शुरू होने वाले पितृ पक्ष अनुष्ठानों पर पड़ सकता है।
आगरा, मथुरा और वृंदावन में 'कर्मकांडी' पंडितों की पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण मौजूदा पंडितों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। पितृ पक्ष का हिंदू पंचांग में खास महत्व है। इस पखवाड़े में हिंदू अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंड दान करते हैं। स्थानीय पंडितों के एक समूह जीवन शोध संस्थान के निदेशक महेश चंद्र शर्मा कहते हैं, "युवा पीढ़ी को पुजारी बनना पसंद नहीं है। इसे इस पीढ़ी के लोग पेशा मानते ही नहीं हैं। मेरा परिवार इसका उदाहरण है। मेरे परिवार के कई बच्चे आईटी और दूसरे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। पूजा कराने का पारिवारिक दायित्व मुझ पर और मेरे छोटे भाई पर छोड़ दिया गया है।"
चूंकि ब्रज मंडल, जिसके दायरे में उपरोक्त इलाके आते हैं, उच्च धार्मिक गतिविधियों वाला क्षेत्र रहा है, इसलिए पंडितों की कमी लोगों के लिए चिंता की बात है। कुछ साल पहले इस समस्या को भांपते हुए आगरा विश्वविद्यालय ने कर्मकांडी पंडितों की जमात पैदा करने के लिए एक कोर्स शुरू किया था, पर युवाओं ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं ली। ऐसे में कोर्स बंद हो गया।
ब्रज मंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा कहते हैं, "लोग अनुष्ठानों को लेकर विशुद्धतावादी होते जा रहे हैं, पर वैदिक रीति से अनुष्ठान कराने वाले लोग आसानी से नहीं मिलते।" वृंदावन और मथुरा के यमुना घाटों पर कर्मकांडी पंडितों की तलाश में लोग भटकते रहते हैं। यहां तक कि श्राद्ध से संबद्ध भोज के लिए भी ब्राह्मण जुटाना कठिन हो गया है। ऐसे में लोगों को भिखारियों को खाना खिलाकर ही संतोष करना पड़ता है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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