कोसी का तटबंध बना लाखों लोगों का आशियाना
कोसी नदी के पूर्वी और पश्चिमी तटबंधों के आसपास रहने वाले लोगों का कहना है कि 'कोसी अपनी मनमर्जी से बहती है।' कभी कोसी की धार पूर्वी किनारे से सट जाती है तो कभी पश्चिमी किनारे को अपने आगोश में ले लेती है। कभी-कभी तो यह दोनों तटबंधों को छोड़कर मध्य से गुजरने लगती है।
कोसी की 'अपनी मर्जी' के कारण प्रतिवर्ष तटबंध के बीच बसे कुल 380 गांवों में बाढ़ का तांडव मचता है। नदी की धारा बदलने से तटबंधों के बीच बसे गांव के अस्तित्व पर ही तलवार लटकती रहती है। इस इलाके में पिछले वर्ष आई बाढ़ में कुछ गांव के निशान ही नक्शे से मिट गए।
सरकारी आंकड़ों की मानें तो इस वर्ष अब तक सुपौल जिले के तीन प्रखंडों के 503 परिवारों को विस्थापित माना गया है। ये सभी तटबंधों पर जिंदगी गुजार हैं। वहीं सुपौल के जिलाधिकारी कुमार रवि का कहना है कि अभी विस्थापितों का सर्वेक्षण कराया जा रहा है। ऐसी स्थिति में इसकी संख्या और बढ़ेगी।
जिले के किसनपुर प्रखंड के कमलदाहा गांव निवासी नरेश कुमार का कहना है, "पिछले वर्ष कुसहा के पास तटबंध के टूटने के बाद आई बाढ़ के बाद तो लाखों हाथ हमारी मदद के लिए उठे लेकिन समय के गुजरने के साथ हमें अब लोग भूल गए हैं। हम अभी भी तटबंध पर ही अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। सच्चाई यही है कि हमलोग तटबंध के कटाव और बाढ़ के अभ्यस्त हो चुके हैं।"
बाढ़ मामलों के विशेषज्ञ प्रेम वर्मा का कहना है, "कोसी के दोनों तटबंधों की दूरी करीब 40 किलोमीटर है, जिसमें जल निकासी की कोई व्यवस्था ही नहीं है। जल निकासी नहीं होगी तो समस्याएं तो होंगी ही। तटबंधों के बीच जीवन गुजार रहे लोगों को आज नहीं तो कल यहां से भी जाना होगा।"
वर्मा का कहना है, "तटबंधों से नदियों को नहीं बांधा जा सकता, नदियां आजाद रहती हैं। मेरा तो मानना है कि तटबंध ही सभी समस्याओं की जड़ है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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