संप्रग सरकार के 100 दिन, कुछ काम हुए, कई चुनौतियां हैं आगे
सरकार ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) के लिए 39.1 अरब रुपये आवंटित किए हैं। इसके अलावा भारत निर्माण कार्यक्रम और शिक्षा का अधिकार जैसे विधेयक को पारित कर यह बता दिया है कि अभी उसे ढेरों काम करने हैं।
सरकार के 100 दिन के कामकाज पर प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा का कहना है कि सरकार के प्रदर्शन के लिए 100 दिन का मापदंड उचित नहीं होगा लेकिन उन्हें सरकार से आशा है।
उन्होंने कहा, "मैं निश्चित नहीं हूं कि इसका मूल्यांकन किया जाए कि सरकार ने क्या हासिल किया और क्या नहीं किया। बहुत कुछ हुआ है और नीतियां तैयार की गई हैं। मैं इसे 50-50 अंक दूंगा।"
दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स के प्रोफेसर सीताराम खन्ना ने कहा, "चीजें जगह पर रखी जा रही हैं, नीतियां कार्यान्वयन के विभिन्न चरणों में हैं। कुछ मामलों में वित्तीय आवंटन किया गया है वहीं कुछ मामलों में कानून बनने से पहले सक्षम अधिकारियों के पास नीतियों को अनुमोदन के लिए भेजा गया है।" उन्होंने कहा कि जनता चाहती है कि सरकार अपने वादों को पूरा करे।
आर्थिक मंदी से उबरने के लक्षण दिखने के बाद सरकार का पूरा ध्यान सूखे की समस्या से निपटने पर टिकी हुई है वहीं स्वाइन फ्लू का प्रकोप भी लगातार बढ़ता जा रहा है। अभी तक इस बीमारी से 75 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है।
सूखे की वजह से सबसे अधिक धान की फसल प्रभावित हुई है। देश में 626 में से 252 जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया जा चुका है।
ब्रिटिश अर्थशास्त्री मेघनाद देसाई ने इस समस्या पर कहा, "सरकार के समक्ष यह सबसे बड़ी चुनौती है और इसके प्रति सरकार तत्पर दिखाई नहीं दे रही है। कृषि मंत्री शरद पवार काम नहीं कर सके हैं।"
देसाई ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की कैबिनेट में 'सुपर पॉवर' का आभास नहीं होता है।
सरकार को 100 दिन में कुछ ऐसे भी क्षणों का सामना करना पड़ा, जब प्रधानमंत्री भी खुद को असहज महसूस कर रहे होंगे। खासकर मिस्र में पाकिस्तान के साथ साझा बयान जारी करने के मुद्दे पर। साझा बयान में बलुचिस्तान को शामिल करने के मुद्दे पर सरकार को विपक्ष की नाराजगी झेलनी पड़ी। विपक्ष ने इसे 'राष्ट्रीय हित' का समर्पण करार दिया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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