भारत को अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर रचनात्मक रहने की जरूरत : प्रधानमंत्री (लीड-2)

उन्होंने कहा कि यदि नई दिल्ली को दुनिया के शीर्ष मंचों पर स्थान पाने की आकांक्षा को पूरा करना है तो उसे जलवायु परिवर्तन और व्यापार वार्ता जैसी वैश्विक समस्याओं के मुद्दों पर सकारात्मक भूमिका निभाने की आवश्यकता है।

उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को फिर से तेज विकास की पटरी पर लाने के लिए सभी प्रयास किए जाने की भी आवश्यकता पर बल दिया।

विदेशों में नियुक्त देश के 112 राजदूतों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत की विदेश नीति और घरेलू नीति विशेषकर आर्थिक नीति के बीच अभिन्न संबंधों पर जोर दिया।

विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित सम्मेलन के दूसरे दिन मनमोहन सिंह ने कहा कि विदेश नीति का उद्देश्य गरीबी, अज्ञानता और बीमारियों जैसी देश की चुनौतियों से निपटना होना चाहिए, जो सरकार की प्राथमिक चिंताएं हैं।

उन्होंने कहा कि वैश्विक आर्थिक मंदी के इस दौर में भी भारत दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करने वाला दूसरा देश है। उन्होंने कहा कि गरीबी और बीमारियों की चुनौतियों का अगर हमें सही तरीके से मुकाबला करना है तो अर्थव्यवस्था को तेज विकास की पटरी पर लौटाने के लिए हर संभव प्रयास किए जाने की जरूरत है।

इस संदर्भ में प्रधानमंत्री ने विदेश नीति के तीन प्रमुख आधारों का उल्लेख किया। इनमें निवेश प्रयासों को गति देने के लिए सतत पूंजी प्रवाह, विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास का लाभ उठाने की जरूरत, और देश में प्राकृतिक संसाधन के अभाव की स्थिति में विकास अवरुद्ध न हो, इसे सुनिश्चित करना शामिल है।

सिंह ने कहा कि विश्व व्यवस्था को नया आकार देने के लिए भारत को सभी अंतर्राष्ट्रीय व्यापारिक, वित्तीय या अर्थव्यवस्था से जुड़े बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भागीदारी करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि दुनिया की बड़ी चुनौतियों चाहे वह व्यापार या जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में हों, के हल के लिए भारत को सकारात्मक रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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