50 साल की हुई 'भारतीय रेल' पत्रिका
भारतीय रेल पत्रिका का पहला अंक 15 अगस्त 1960 को प्रकाशित हुआ था। पत्रिका के शुरू कराने में लाल बहादुर शास्त्री तथा बाबू जगजीवन राम का विशेष योगदान रहा। हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में इस पत्रिका का काफी योगदान रहा है।
इस पत्रिका के शुरुआती संपादक मंडल के सदस्यों में डी.सी. बैजल (कमचारी वर्ग) रेलवे बोर्ड, डी.पी.माथुर (निदेशक वित्त), आर.ई.डी. (सचिव, रेलवे बोर्ड), जी.सी.मीरचंदानी (सह-निदेशक, जन-संपर्क), राममूर्ति सिंह (हिंदी अफसर, रेलवे बोर्ड), कृष्ण गुलाटी (संपादक) तथा रामचंद्र तिवारी (सहायक संपादक, हिंदी) शामिल थे।
मौजूदा समय में पत्रिका के संपादन का दायित्व अरविंद कुमार सिंह (परामर्शदाता, भारतीय रेल) निभा रहे हैं। प्रवेशांक से लेकर लंबे दौर तक पत्रिका को गरिमापूर्ण स्थान तक पहुंचाने का श्रेय रामचंद्र तिवारी को जाता है।
पत्रिका के प्रकाशन के अवसर पर तत्कालीन रेल मंत्री जगजीवन राम, रेल उपमंत्री शाहनवाज खां के बहुत सारगर्भित संदेश प्रकाशित किए गए थे। पत्रिका के पहले संपादकीय में रेल कर्मचारियों की वेतन वृद्धि पर रोशनी डाली गई थी।
पत्रिका के शुरुआत में संपादकीय, सुना आपने, रेलों के अंचल से, भारतीय रेलें सौ साल पहले और अब, कुछ विदेशी रेलों से, क्रीड़ा जगत में रेलें, मासिक समाचार चयन, रेलवे शब्दावली और हिंदी पर्याय, कविता, कहानी जैसे रोचक स्थाई स्तंभ थे। 'भगत जी' कार्टून के माध्यम से भी रेलकर्मियों और यात्रियों के जागरण का प्रयास किया गया।
इस पत्रिका के प्रतिष्ठित लेखकों में स्व. विष्णु प्रभाकर, स्व. कमलेश्वर, रस्किन बांड, डा. प्रभाकर माचवे, पी.डी. टंडन, रतनलाल शर्मा, श्रीनाथ सिंह, रामदरश मिश्र, डा.शंकर दयाल सिंह, विष्णु स्वरूप सक्सेना, डा. महीप सिंह, यशपाल जैन, राजेंद्र अवस्थी जैसे लोग शामिल रहे।
भारतीय रेल में 1960 के बाद के सभी रेल बजट तथा उन पर सारगर्भित समीक्षाएं विस्तार से प्रकाशित हुई हैं। इस दौर की सभी प्रमुख रेल परियोजनाओं, खास निर्णयों और महत्वपूर्ण घटनाओं को भारतीय रेल में प्रमुखता से कवरेज दिया गया। अनुसंधानकर्ताओं के लिए यह पत्रिका एक अनिवार्य संदर्भ बन गई है।
भारतीय रेल पत्रिका को रेलकर्मियों तथा अन्य क्षेत्रों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए कई स्तर पर प्रयास किए जाते रहे हैं। कालांतर में पत्रिका को कई राज्य सरकारों की ओर से भी प्रोत्साहन मिला और आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब, केरल, असम, हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल में वहां के शिक्षा विभागों ने अपने स्कूलों और कालेजों के लिए इसे मान्य पत्रिका घोषित कर दी।
पत्रिका में परिवहन के अन्य क्षेत्रों के बारे में शुरू से ही उचित सामग्री प्रदान की जाती रही है। इसी तरह रेलवे की सभी प्रमुख विकास गतिविधियों का भी कवरेज होता रहा है। स्तरीय साहित्य तो पत्रिका के पहले ही अंक से देखने को मिलता है। यही नहीं पत्रिका में अवधी में भी कविताएं छापी गई हैं। नई कृतियों से पाठकों को अवगत कराने में भी पत्रिका का खास योगदान रहा है।
भारतीय रेल के विशेषांक भी पाठकों द्वारा विशेष रूप से सराहे गए हैं। रेलवे के मौजूदा वार्षिक विशेषांक को पहले रेल सप्ताह विशेषांक के नाम से प्रकाशित किया जाता था। भारतीय रेल ने जनवरी 1976 में ललित नारायण मिश्र स्मृति अंक निकाला था, जिसमें बंशीलाल, पंडित कमलापति त्रिपाठी से लेकर कई राजनेताओं के विशेष आलेख और संस्मरण प्रकाशित किए गए थे।
विशेषांकों की कड़ी में भारतीय रेल का राजभाषा हिंदी अंक (फरवरी 1976) राजभाषा पर प्रकाशित अन्य पत्रिकाओं के विशेषांकों की तुलना में मील का पत्थर माना जाता है। भारतीय रेल का 1979 में प्रकाशित पर्यटन अंक तो इतना लोकप्रिय हुआ था कि पाठकों की मांग को पूरा करने के लिए उसे पुनर्मुद्रित कराना पड़ा था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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