प्रधानमंत्री ने न्यायाधीशों के रिक्त पदों को भरने पर दिया जोर (राउंडअप)

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब लंबित पड़े 3.118 करोड़ मुकदमों को शीघ्र निपटाने का न्यायपालिका से आग्रह किया तो प्रधान न्यायाधीश बालाकृष्णन ने न्यायाधीशों की भारी कमी का रोना रोया और देश की आबादी के अनुपात में अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति की मांग की।

प्रधानमंत्री ने आबादी के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की बात को स्वीकार तो किया, लेकिन उन्होंने फिलहाल निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में रिक्त पदों को भरने पर जोर दिया।

इस तरह यहां विज्ञान भवन में आयोजित विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों और मुख्य न्यायाधीशों के वार्षिक सम्मेलन में प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश के संबोधनों में लंबित पड़े मुकदमों के मुद्दे पर कार्यपालिका और न्यायपालिका की प्राथमिकताएं थोड़ी ऊपर-नीचे होती प्रतीत हुईं।

इस सम्मेलन में कानून व न्याय मंत्री एम.वीरप्पा मोइली और सर्वोच्च न्यायालय के कई न्यायाधीश भी उपस्थित थे।

देश की न्यायपालिका की आंतरिक गुणवत्ता और क्षमता का जिक्र करते हुए मनमोहन सिंह ने कहा, "भारतीय न्यायपालिका में क्षमता, प्रतिभा और जोश होने के बावजूद देश दुनिया में सबसे अधिक लंबित मुकदमों की पीड़ा से गुजर रहा है।"

प्रधानमंत्री ने कहा, "देश के न्यायालयों में भारी संख्या में लंबित मामले न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती हैं।"

मनमोहन सिंह ने कहा कि गांधी जी जिस आम आदमी की बात करते थे, न्यायपालिका को समाज के उस अंतिम व्यक्ति के आंसू पोछने के लिए आगे आना चाहिए।

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, "30 जून 2009 तक के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में 52,592 मामले लंबित पड़े हुए हैं। 4,017,956 मामले उच्च न्यायालयों में लंबित हैं और 27,119,092 मामले निचली अदालतों में लंबित हैं।"

बालाकृष्णन ने कहा, "मैंने न्यायिक प्रणाली के लिए खर्च में बढ़ोतरी करने के लिए बार-बार कहा है। रिक्त पदों को भरने के लिए तथा अतिरिक्त न्यायाधीशों के पदों की मंजूरी के लिए कहा है। क्योंकि यहां न्यायाधीशों की भारी कमी बनी हुई है।"

बालाकृष्णन ने कहा, "वर्ष 1987 में लॉ कमीशन की 124वीं रिपोर्ट में विकसित देशों के 'न्यायाधीश और जनसंख्या' अनुपात का मुकाबला करने के लिए हमारी न्याय प्रणाली में कम से कम पांच गुना विस्तार करने का संकेत किया गया था।"

प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में वर्तमान पदों की रिक्तियों को भरने की बात कही। उन्होंने कहा, "उच्च न्यायालयों में वर्तमान रिक्तियां संख्या के मामले में काफी अधिक हैं और इन्हें तत्काल भरे जाने की जरूरत है। मैं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों से अपील करता हूं कि वे रिक्त पदों को भरने के संबंध में शीघ्र प्रस्ताव बनाएं, जिससे इन पदों को भरा जा सके।"

प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें बताया गया है कि निचली अदालतों में न्यायाधीशों के करीब 3,000 पद रिक्त हैं। इन पदों को बिना समय गंवाए भरे जाने की जरूरत है।

उन्होंने देश की न्यायपालिका से एक अखंड तंत्र के रूप में काम करने को कहा और आश्वस्त किया कि सरकार किसी भी मौके पर न्यायपालिका को सहयोग देने में पीछे नहीं हटेगी।

उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया में भारत में सबसे अधिक लंबित मामले हैं और मुकदमों में सबसे अधिक समय लगता है। यह विश्व के लिए आश्चर्य और देश के लिए चिंता का विषय है। इनको निपटाने को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।

मनमोहन सिंह ने कहा कि इन लंबित मामलों को निपटाने में न्याय व्यवस्था के हर अंग को एक अखंड तंत्र के रूप में काम करना चाहिए। एक संगठनकर्ता, एक संरक्षक, एक निर्णायक, एक भागीदार और सबसे ऊपर एक आदर्श के रूप में इसमें सर्वोच्च न्यायालय की एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

उन्होंने कहा कि निचली अदालतों में मामले लंबित होने की वजह से जेलों में विचाराधीन कैदियों की बड़ी संख्या हमारे लिए चिंता का विषय है।

प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर घोषणा की कि मुख्य न्यायाधीश के.जी. बालाकृष्णन की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा जांच किए जा रहे मामलों की सुनवाई के लिए 71 और विशेष अदालतों को स्थापित करने के लिए कदम उठाए हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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