राजीव गांधी की हत्या की साजिश से अवगत था केपी

नई दिल्ली, 7 अगस्त (आईएएनएस)। श्रीलंकाई सुरक्षा बलों की हिरासत में पहुंचा लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) का नया प्रमुख सेलवरासा पद्मनाथन ऊर्फ केपी को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश के बारे में महीनों पहले से जानकारी थी।

केपी ने नवंबर, 1990 में तमिलनाडु में एक श्रीलंकाई तमिल से कहा था कि लिट्टे जल्द ही 'भारतीय नेतृत्व' को निशाना बनाएगा। हालांकि उसने राजीव गांधी का नाम नहीं लिया था। शुक्रवार को श्रीलंकाई रक्षा मंत्रालय ने उसे पकड़ने का दावा किया है। वेल्लुपिल्लई प्रभाकरन के मारे जाने के बाद उसे लिट्टे की कमान सौंपी गई थी।

उल्लेखनीय है कि राजीव गांधी की 21 जून, 1991 को चेन्नई के निकट एक जनसभा में महिला आत्मघाती हमलावर द्वारा हत्या कर दी गई थी। इससे छह महीने पहले ही केपी यह सनसनीखेज खुलासा टेलीफोन के जरिए कर चुका था।

अगर मीडिया के हवाले से आई खबरों पर गौर करें तो केपी राजीव हत्याकांड का आरोपी नहीं है। परंतु 'मल्टी डिस्पिलनरी मॉनिटरिंग अथॉरिटी' (एमडीएमए) की नजर में वह संदिग्ध है। एमडीएमए राजीव गांधी की हत्या से जुड़ी साजिश की जांच आज भी कर रहा है।

राजीव गांधी की हत्या के बारे में केपी की पूर्व जानकारी ने भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को सकते में डाल दिया है।

चूंकि गांधी की हत्या जैसे गुप्त निर्णय के बारे में लिट्टे के खास दल को ही बताया गया था, ऐसे में सवाल यह उठता है कि इस योजना के बारे में केपी के पास जानकारी कैसे पहुंची।

इसके पीछे एक कारण यह समझ में आता है कि लिट्टे केपी पर पूरी तरह निर्भर था, क्योंकि वह विद्रोहियों के लिए विदेशों से हथियारों की खरीद करने वाला एक प्रमुख माध्यम था।

ऐसे में लिट्टे को लगा होगा कि केपी को राजीव गांधी की हत्या की साजिश के बारे में पहले से बता देना चाहिए, क्योंकि राजीव गांधी की हत्या से उत्पन्न होने वाला अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव हथियारों और गोला-बारूद का बंदोबस्त करने वाले अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क को खतरे में डाल सकता है।

लिट्टे की खुफिया इकाई से बाहर तिरुचई शांथन को भी राजीव गांधी की हत्या की साजिश के बारे में पहले से पता था। शांथन ने 1990 से 91 तक तमिलनाडु में लिट्टे की कमान संभाली थी।

अब केपी श्रीलंकाई सरकार की गिरफ्त में है। ऐसे में अगर भारत सरकार अपनी सुरक्षा एजेंसियों से केपी से पूछताछ के लिए कहे तो यह उपयोगी साबित हो सकता है।

एक समय जिस तरह से प्रभारकन के बगैर लिट्टे की कल्पना नहीं जा सकती थी, उसी तरह प्रभारकन और केपी भी एक दूसरे के बेहद करीब थे। केपी ने कभी भी सैन्य प्रशिक्षण नहीं लिया।

वर्ष 1984 में जब वह भारत में था, तब प्रभाकरन ने लिट्टे के भीतर ही एक अतिगोपनीय समूह गठित करने का फैसला किया था। इसका मकसद पूरी दुनिया से लिट्टे के लिए हथियार खरीदना था। इस काम के लिए प्रभाकरन ने केपी पर ही भरोसा जताया था।

केपी ने कई देशों में कई कंपनियों का गठन किया था, जिसका मकसद सोने और मादक द्रव्यों की तस्करी करना था। इसके जरिए मिले पैसों को उसने हथियार खरीदने में इस्तेमाल किया था। उसने 1980 के दशक में गुप्त रूप से तमिलनाडु में एक डेयरी का संचालन भी किया था।

लिट्टे के लिए केपी ने एक गुप्त पोत नेटवर्क स्थापित किया था, जिसके जरिए विदेशों से हथियारों का आयात किया जाता था। उसने इस काम को बेहद गुप्त ढंग से अंजाम दिया और इसकी खबर सिर्फ प्रभाकरन को थी।

केपी ज्यादातर समय विदेश में रहा और वहीं से लिट्टे के लिए सक्रिय भूमिका निभाता रहा। अलग-अगल पहचान के साथ उसने लेबनान, थाई-कंबोडिया सीमा, फ्रांस, ब्रिटेन, स्वीडन, ग्रीस, साइप्रस, हांगकांग, दक्षिण कोरिया, जापान, सिंगापुर, म्यांमार और मलेशिया का दौरा किया।

केपी की वजह से ही लिट्टे को पहला छोटा विमान हासिल हो सका था। बाद में उसके और प्रभाकरन के बीच दूरियां बढ़ गईं थीं। वर्ष 2003 से प्रभाकरन उससे दूरी बनाने लगा था और कास्त्रो को अपना करीबी बनाया। परंतु प्रतिभा के मामले में कास्त्रो केपी के सामने कहीं नहीं ठहरता था।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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