बुन्देलखंड में 'सावनी' हो गई बेगानी
शादी के बाद पहले सावन माह में नवविवाहिता के मायके में रहने की परंपरा है। इस त्यौहार को वह पूरे उमंग और उत्साह से मनाए, इसका ख्याल ससुराल पक्ष रखता रहा है। इसीलिए सावन के माह में ससुराल पक्ष की ओर से लड़की को एक विशेष भेंट 'सावनी' भेजी जाती थी। इस सावनी में लड़की के छोटे भाई बहनों और भतीजे-भतीजी के लिए खेल खिलौने चकरी, बांसुरी, गुड्डा गुड़िया, भौंरा, चपेटा के साथ कपड़े आदि हुआ करते थे।
ससुराल पक्ष के कई लोग इस 'सावनी' को लेकर लड़की के घर जाते थे। यह सावनी लड़की और उसके परिवार के लिए विशेष मायने रखती थी, क्योंकि इस सावनी को पूरे गांव के लोगों को दिखाया जाता था। गांव में सावनी का आना उत्सव का रूप ले लेता था। वहीं दूसरी ओर वापसी में लड़की द्वारा बनाए गए व्यंजन और अन्य सामान ससुराल भेजा जाता था।
वक्त गुजरने के साथ 'सावनी' की परंपरा को भी ग्रहण लग गया है। बुन्देलखंड की लोक परंपराओं के जानकार हरगोविन्द कुशवाहा बताते हैं कि 'सावनी' वह परंपरा थी जो दो परिवारों के बीच स्नेह और संबंधों को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। अन्य परंपराओं की तरह 'सावनी' पर भी आधुनिकता की मार पड़ी है और वह कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गई है।
कुशवाहा कहते है कि सूखा, गरीबी और भुखमरी से जूझ रहे बुन्देलखंड में न तो अब सावन का वह नजारा बचा है जो हर किसी को आनंदित कर देता था तथा न ही 'सावनी' जैसी परंपरा को निभाने वाले लोग बचे है। समस्याओं ने तो बुन्देलखंड की परंपराओं को ही संकट में डाल दिया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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