देश में स्वाइन फ्लू से मौत का पहला मामला पुणे में सामने आया (राउंडअप)
स्वास्थ्य अधिकारियों ने कहा है कि छात्रा पिछले पंद्रह दिनों से फ्लू से पीड़ित थी और इलाज में देरी होने के कारण उसकी मौत हो गई।
इस बीच सोमवार को सात अन्य लोगों में फ्लू के वायरस की पुष्टि हुई है। इसके साथ ही देश में फ्लू ग्रस्त रोगियों की संख्या 558 हो गई है। इनमें से 470 पीड़ितों को पूर्ण स्वस्थ होने के बाद अस्पतालों से छुट्टी दी जा चुकी है। अब तक लगभग 2,479 संदिग्धों की जांच की जा चुकी है।
फ्लू के कारण छात्रा की मौत की पुष्टि करते हुए स्वास्थ्य सचिव नरेश दयाल ने नई दिल्ली में कहा कि छात्रा को फ्लू निरोधक दवा बहुत विलंब से दी गई।
दयाल ने एक समाचार चैनल पर अपनी टिप्पणी में कहा, "इससे यह जाहिर होता है कि उसका इलाज सही समय पर नहीं हुआ। यदि पहले ही उसका इलाज हुआ होता तो उसे बचाया जा सकता था। यह एक चिंता का विषय है।"
एक स्वास्थ्य अधिकारी ने पुणे में आईएएनएस को बताया, "पीड़ित रिया शेख को 21 जुलाई को एक निजी अस्पताल (जहांगीर हास्पिटल) में भर्ती कराया गया था। प्राथमिक सूचना के अनुसार सोमवार की शाम उसकी मौत हो गई।"
अधिकारी ने कहा कि स्वाइन फ्लू की राजधानी बन चुके पुणे में फ्लू पीड़ित रोगियों की संख्या सोमवार को 102 पहुंच गई। उनमें 86 बच्चे (ज्यादातर स्कूली बच्चे) शामिल हैं।
बताया गया है कि फ्लू के लक्षण से ग्रस्त इस छात्रा ने पहले 21 जुलाई को एक सामान्य चिकित्सक से संपर्क किया था। स्थिति में सुधार होने के बाद वह 23 जुलाई से स्कूल जाने लगी थी।
स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी एक बयान के अनुसार, "25 जुलाई को उसे फिर बुखार हुआ। उसके बाद उसने एक अन्य निजी चिकित्सक से संपर्क किया। लेकिन उसका बुखार बना रहा और 27 जुलाई को उसे पुणे के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।"
बयान में कहा गया है कि लड़की की हालत बिगड़ गई और उसके बाद उसे गहन चिकित्सा कक्ष (आईसीयू) में स्थानांतरित कर दिया गया, उसे 29 जुलाई को जीवन रक्षक यंत्र पर रखा गया। उसके फेफड़े की वायु को जांच के लिए 31 जुलाई को राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान (एनआईवी) भेजा गया और उसमें फ्लू के वायरस की पुष्टि हुई।
बयान में कहा गया है कि 30 जुलाई को उसे टैमीफ्लू की खुराक दी गई। लेकिन उसकी हालत दोबारा बिगड़ गई और तीन अगस्त की शाम छात्रा का निधन हो गया।
स्वास्थ्य अधिकारी इस बात को लेकर सकते में हैं कि फ्लू की एक गंभीर मरीज किसी निजी अस्पताल में कैसे रह गई। वे इस बात का पता लगा रहे हैं कि इस मामले के बारे में प्रशासन को सूचित किया गया था या नहीं।
पुणे के डिविजनल आयुक्त दिलीप भान ने कहा है, "हमें इस रोगी के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसने निजी अस्पताल में इलाज कराया था। लोगों को निजी अस्पतालों में नहीं जाना चाहिए और इसके बदले सरकारी अस्पतालों में जाना चाहिए।"
स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से कहा गया है कि छात्रा का इलाज करने वाले तीन चिकित्सकों और एक नर्स में सांस की समस्या पैदा हो गई है और उन्हें ओसेल्टामिवीर की खुराक दी जा रही है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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