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जहरीली शराब पीकर मरने वाले कौन थे?

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भोपाल, 1 अगस्त (आईएएनएस)। लाभ और स्वार्थ की कीमत क्या होगी और वह कौन चुकाएगा, यह सवाल वर्तमान समाज के सामने होना चाहिए पर हम सब इस पर मौन हैं। भारत के मूल में एक द्विपक्षीय या कहें कि दो चरित्रों वाली द्विस्तरीय व्यवस्था गहरे तक जड़ें जमा चुकी है।

बहुत से विश्लेषण कहते हैं कि बाजार और अर्थ (पूंजी) के सिद्धांतों को आप जीवन स्तर मान लीजिए और पूंजीवाद को धर्म, तो सारी असमानताएं और शोषण खत्म हो जाएगा।

हम पिछले 40 सालों के पूंजी और बाजार को किसी न किसी रूप में बढ़ाते और स्वीकारते रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या असमानताएं कुछ कम हुईं या इसका ढांचा भर बदल गया!

ताजा उदाहरण गुजरात है जहां 200 लोग जहरीली शराब पीकर मौत के शिकार हो गए। इस समाचार में घटना बहुत तथ्यात्मक है और कारण भी, पर सच क्या केवल इतना ही है। शायद सच इससे थोड़ा नहीं, बल्कि बहुत गहरा है। भारत का कभी भी एक चेहरा नहीं रहा है। इसके हमेशा दो चेहरे रहे हैं। हमारे इसी देश में दो भारत रहे हैं। भारत ही एक ऐसा देश है जहां अमीर और गरीब की शराब अलग-अलग होती।

यहां बाकायदा यह बताया जाता है कि देशी और अंग्रेजी शराब भी समाज के स्वरूप के मुताबिक ही बाजार में आते हैं। जो गरीब है, उनके लिए बनने वाली शराब में स्पिरिट और तेजाब होता है, कभी-कभी यूरिया भी मिलाया जाता है। इन तत्वों के बारे में बताया जाता है कि इनसे आंतों में घाव होते हैं, लिवर खराब होता है और कैंसर होता है।

यह तो हर मेडिकल जर्नल कहता है और सरकार भी यही कह कर बेचती है कि शराब घातक है। पर सरकार यह नहीं बताती कि देशी शराब के नाम पर वास्तव में जहर बाजार में बनता और बिकता है। अब चूंकि आबकारी सरकार के लिए कमाई का साधन है, इसिलए यह जहर तो बिकेगा ही। और साल दर साल कमाई बढ़ाने के लिए यह प्रयास होते हैं कि बिक्री कैसे बढ़े और उत्पादन लागत कैसे कम हो ताकि शराब बेचने वालों का फायदा ज्यादा बढ़े।

देशी शराब एक सबसे उत्तम विकल्प बनता है। लागत कम करने के लिए इसमें खतरनाक तत्व मिला दिए जाते हैं। जब तक चलता है, तब तक फायदा और अगर इसका असर यानी घातक असर दिखा या लोग मरे तो ज्यादा दिक्कत नहीं, क्योंकि मरने वाले तो गरीब, गांव के दलित, आदिवासी या मजदूर ही होंगे।

गुजरात में गांधी जी की जन्मस्थली होने के नाम पर शराब बनाने और बेचने पर प्रतिबंध है, पर यहां हर साल 3000 करोड़ की शराब का व्यापार होता है। गुजरात में प्रतिबन्ध के बावजूद होने वाला यह व्यापार, कई उन राज्यों से ज्यादा है, जहां शराब प्रतिबन्धित नहीं है। इसका मतलब यह है कि वहां अफसरशाही, राजनेताओं को निश्चित रूप से अपने हित साधने के ज्यादा सुनहरे अवसर मिलते होंगे।

दूसरी बात यह है कि भारत में शराब के कारण होने वाली मौतों में 97 फीसदी देशी शराब के कारण होती है, और मरने वाले वंचित तबकों से जुड़े लोग होते हैं। ऐसी बात नहीं है कि शराब के मामलों में हम एक गरीब देश में रहते हैं। भारत में दुनिया की सबसे अच्छी गुणवत्ता की शराब बनती है, पर वह समाज के उन तबकों के लिए बनती है जो ऊंचे मुकामों पर हैं। यह भी एक मान्यता है कि गरीबों और वंचितों के जीवन की कीमत बहुत ज्यादा नहीं है, इसिलए उन्हें धीमे-धीमे जाम के नाम पर ज़हर भी पिलाया जा सकता है। यह दूसरा भारत है।

पिछले 9-10 सालों में गुजरात की एक ख़ास किस्म की विरोधाभासी पहचान बनी है। सांप्रदायिक दंगों में मुसलामानों के खिलाफ सरकार की भूमिका के कारण या तो इसे मुस्लिम विरोधी राज्य के रूप में जान जाने लगा या फिर यह अति पूंजीवादी विकास की राह पर चल कर, मानवीय विकास की कीमत पर आर्थिक विकास करने वाले राज्य की पहचान पा गया। यहां खूब उद्योग लगे और कंपनियों को 4 लाख करोड़ रुपये की जमीनें दे दी गईं, जो या तो सार्वजनिक जमीनें थीं या फिर लोग उनका उपयोग करके अपनी आजीविका चलाते थे।

इसके दूसरी तरफ गुजरात के बच्चों में कुपोषण बढ़ गया। यह कैसा विकास हुआ। यहां मूल्यों का नकाब बना कर सरकार ने पहना और उन्हीं मूल्यों को तहस-नहस करने की नीतियों को अंजाम दिया। गोधरा का नरसंहार किसी ने भी किया, उस पर खूब बहस हुई, सरकार ने उस पर जांचें की, चुनाव लड़े गए और उसी को आधार बना कर सांप्रदायिक नरसंहारों की पूरी गाथा लिख डाली गई। वहां औरतों के साथ बलात्कार हुए, गर्भवती महिलाओं को गर्भविहीन कर दिया गया, इस अंधेपन में यह भी नहीं देखा गया कि हिंसा की तलवार बच्चों की गर्दन पर जा रही है।

जून 2009 में गैरकानूनी और जहरीली शराब के कारण 200 लोगों के मरने के बाद भी वह सामाजिक न्याय का मुद्दा नहीं बना, शायद उसमें हिंदू-मुसलमान वाला टकराव नहीं था, शराब बनाने वाले शायद मुसलमान नहीं थे। इसमें धर्म की राजनीति के लिए उतना स्थान नहीं था, तो मीडिया को भी रस नहीं आया और 3-4 दिन तक दुर्घटना कवर करने की औपचारिकता करके उस पर मौन साध लिया गया। 200 जानें जाने के बाद भी इस मसले पर जांच आयोग नहीं बना क्योंकि इसमें राज्य-केंद्र के कोई दीर्घकालिक फायदे नहीं थे और मरने वाले केवल गरीब थे।

जब हम यह कहते हैं कि गुजरात में गैर कानूनी रूप से हर साल 3000 करोड़ रुपए की अवैध शराब का कारोबार चलता है तो इसका मतलब यह है कि सरकार (जिसमें पक्ष और विपक्ष दोनों शामिल हैं), पुलिस और कानून लागू करने वालों की इस मामले में बहुत दूर तक जाने में तो कोई रूचि हो ही नहीं सकती। क्योंकि इसमें उनका भी तो 800 से 1000 करोड़ रुपए का हिस्सा शामिल है। यहां आप इन सबके बीच एक संगठित गठजोड़ देख और महसूस कर सकते हैं। यह गठजोड़ समाज के वंचित तबकों के जीवन को भट्ठी में जला कर अपने लिए 56 पकवानों की थाली पकाता है।

गुजरात तो एक प्रतीक भर है। जो स्थिति मुसलामानों की गुजरात में है वही कश्मीरी पंडितों की कश्मीर में और मध्य प्रदेश के किसी भी गांव में परिधियों की है। और अब नए सन्दर्भो में बिहारियों और उत्तर प्रदेश के लोगों को महाराष्ट्र में दोयम दर्जे के नागरिक के रूप में देखते हुए उनकी खिलाफत की जाने लगी है। यह साम्प्रदायिकता का नया पूंजीवादी रूप है, जिसमें संसाधनों पर नियंत्रण रखने के लिए अब केवल हिन्दू-मुसलमान का टकराव होना जरूरी नहीं है। आर्थिक ताकत के लिए राज्यों और संस्कृतियों के आधार पर भी हिंसक टकराव होने लगे हैं।

एक तरफ तो भूमंडलीकरण के पक्षधर होकर हम लोट-पोट हुए जा रहे हैं, पर महाराष्ट्र की राजनीति अपनी जमीन पर बिहारी और उत्तर भारतीयों को फूंटी आंख नहीं देखना चाहती है। यह कोई छिपा हुआ विरोधाभास नहीं है, बल्कि इससे हमें पता चलता है कि सांप्रदायिक और वर्ग आधारित दंगे या टकरावों के पीछे केवल एक मंशा होती है, बंटवारे और भय को पैदा करने की, ताकि मूल्यहीन और अनैतिक राजनीति का विरोध ना हो और समाज मौजूदा व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार कर ले।

(सचिन कुमार जैन गैर सरकारी संगठन 'विकास संवाद' से जुड़े हैं।)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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