लिट्टे के पतन के बाद भी भारत पहुंच रहे हैं श्रीलंकाई तमिल
नई दिल्ली, 31 जुलाई (आईएएनएस)। श्रीलंका में विद्रोही संगठन लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (लिट्टे) के पतन के दो महीने बीत जाने के बाद भी श्रीलंका से तमिल नागरिकों के भारत आने का सिलसिला जारी है। लेकिन अब ज्यादातर यात्री वायु मार्ग से भारत पहुंच रहे हैं और पहले की तुलना में उनकी संख्या में कमी भी हुई है।
लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन और उसके वरिष्ठ सहयोगी मई महीने में मारे गए थे। उस महीने में तमिलनाडु में श्रीलंका से 109 तमिल पहुंचे थे। जून में यह संख्या बढ़कर 142 हो गई, जबकि जुलाई में केवल 89 श्रीलंकाई तमिल यहां पहुंचे हैं।
भारत में दो दशकों से अधिक समय से तमिल शरणार्थियों के लिए काम कर रहे श्रीलंकाई कार्यकर्ता एस.सी.चंद्रहासन ने कहा कि श्रीलंका के तटीय इलाकों में नौसेना की उपस्थिति के कारण अब कुछ तमिल जलमार्ग से भी तमिलनाडु पहुंच रहे हैं।
चंद्रहासन ने आईएएनएस से कहा, "अब अधिकतर लोग हवाई जहाज की मदद ले रहे हैं, क्योंकि समुद्र का रास्ता आसान नहीं है। यह बहुत खतरनाक और महंगा है।"
मई में 109 लोगों में से केवल 13 लोग ही नाव से यहां आए थे। इसी प्रकार जून में 39 और जुलाई में 10 लोग ही समुद्री मार्ग से तमिलनाडु पहुंचे थे।
चंद्रहासन ने कहा कि उत्तरी श्रीलंका के विभिन्न शरणार्थी शिविरों में रहने वाले 280,000 लोग भारत में नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहते हैं और इसके लिए वे पूछताछ कर रहे हैं।
चंद्रहासन ने कहा कि शरणार्थी शिविरों में रहने वाले लोग भारत आने को इच्छुक हैं लेकिन यदि श्रीलंका में ही स्थिति उनके अनुकूल हो जाती है तो वे भारत नहीं आना चाहेंगे।
आंकड़ों के अनुसार एक जून तक तमिलनाडु के विभिन्न शरणार्थी शिविरों में 73,475 श्रीलंकाई तमिल मौजूद थे। चंद्रहासन ने कहा कि श्रीलंकाई तमिल भारत में इसलिए आना चाहते हैं, क्योंकि श्रीलंका में उन्हें खतरा महसूस होता है।
चंद्रहासन ने कहा कि यदि आप उनसे बात करेंगे तो इसका अंदाजा आपको लग जाएगा। वे अभी भी खुद को सुरक्षित नहीं मान रहे हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या लिट्टे कार्यकर्ता भी भारत आ रहे हैं? तो उन्होंने कहा, "लिट्टे का कोई उच्च पदस्थ नेता यहां नहीं पहुंचा है। कुछ लोग ऐसे जरूर हो सकते हैं, जिनका लिट्टे से संबंध हो।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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