नेपाल में हिंदी की लड़ाई ने जोर पकड़ा
काठमांडू, 29 जुलाई (आईएएनएस)। नेपाल में सरकारी कामकाज में हिंदी के इस्तेमाल की लड़ाई ने बुधवार को जोर पकड़ लिया। इस लड़ाई के सूत्रधार उप राष्ट्रपति परमानंद झा ने राष्ट्र से भाईचारे की भावना और शांति बनाए रखने की अपील की है।
नेपाल के पहले उप राष्ट्रपति के रूप में पिछले वर्ष शपथ लेने वाले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश झा ने यह अपील तब की है, जब इस बात को लेकर अफवाह उड़ने लगी कि अदालत द्वारा दोबारा नेपाली भाषा में पद व गोपनीयता की शपथ लेने का आदेश दिए जाने के विरोध में वह इस्तीफा देने वाले हैं।
यह भाषा विवाद पिछले वर्ष तब शुरू हुआ, जब झा ने पद व गोपनीयता की शपथ हिंदी में ली।
यह कोई इकलौती घटना नहीं है। झा से पहले तराई से निर्वाचित सांसदों ने भी हिंदी भाषा में ही शपथ ली थी।
नेपाल को एक संघीय गणराज्य घोषित किए जाने के बाद अन्य स्वदेशी समुदाय के सांसदों ने भी अपनी-अपनी मातृभाषा में ही शपथ ली थी।
लेकिन एक अति राष्ट्रवादी अधिवक्ता बालकृष्ण नुपाने ने अदालत में यह कहते हुए एक कानूनी याचिका दायर कर दी कि उप राष्ट्रपति चूंकि एक गैर राजनीतिक पद है, लिहाजा झा को पूरे देश का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, न कि किसी खास भाषा-भाषी समुदाय का।
याची ने सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया था कि झा द्वारा हिंदी में ली गई शपथ अवैध करार दी जाए और उन्हें नेपाली में फिर से शपथ लेने का आदेश दिया जाए।
इस याचिका पर पिछले सप्ताह प्रधान न्यायाधीश मान बहादुर रायामाझी के नेतृत्व वाली सर्वोच्च न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ ने अपने एक आदेश में झा द्वारा हिंदी में ली गई शपथ को असंवैधानिक और अवैध घोषित कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने उप राष्ट्रपति को नेपाली भाषा में दोबारा शपथ लेने का आदेश भी दिया था।
झा ने अदालत के इस फैसले को बुधवार को पक्षपातपूर्ण और प्रतिशोधात्मक बताया।
झा ने कहा है कि वह दोबारा नेपाली में शपथ तभी लेंगे जब जनता ऐसा चाहेगी। वह इस मामले में अदालत का आदेश नहीं मानेंगे।
इस संकटपूर्ण स्थिति में प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल ने कोई बीच का रास्ता निकालने के लिए कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श लेना शुरू कर दिया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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