अदालत ने कुंबले की पत्नी से बेटी का मसला आपस में सुलझा लेने को कहा
न्यामूर्ति तरुण चटर्जी और न्यायमूर्ति आर.एम.लोढा की एक खंडपीठ ने सोमवार को चेतना कुंबले और उनके पूर्व पति जागीरदार को यह सलाह मामले की सुनवाई के दौरान दी। चेतना ने अपनी बेटी पर अपने अधिकार को लेकर बेंगलुरू की एक परिवार अदालत के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी है। बेटी फिलहाल उनके साथ रह रही है।
खंडपीठ ने दोनों को बेटी के मसले को आपसी बातचीत के जरिए सुलझाने की कोशिश करने की सलाह दी और इसके लिए तीन सप्ताह का समय दे दिया।
ज्ञात हो कि चेतना ने अपने पूर्व पति जागीरदार के साथ वर्ष 1999 के प्रारंभ में तलाक ले लिया था।
पहले पति से तलाक लेने के महीने भर के भीतर उन्होंने कुंबले से शादी रचा ली थी। इसके बाद चेतना ने अपनी छह वर्षीय बेटी को हासिल करने के लिए दिसंबर 1999 में बेंगलुरू के परिवार अदालत में याचिका दायर कर दी। बेटी जागीरदार के पास छूट गई थी।
इस पर जागीरदार ने भी बेटी पर हक को लेकर परिवार अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने अपने फैसले में बेटी पर जागीरदार के अधिकार जायज करार दिया।
बाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने चेतना की एक याचिका पर बेटी को मां के हवाले करने का आदेश दे दिया। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने भी उच्च न्यायालय के फैसले पर मुहर लगा दी।
लेकिन वर्ष 2006 में चेतना की दूसरी शादी के बाद जागीरदार ने बदली परिस्थितियों का हवाला देते हुए फिर से बेटी पर हक को लेकर परिवार अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। अब चेतना ने उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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