दोषियों को आपराधिक न्याय में हस्तक्षेप का मौका न दें : अदालत

नई दिल्ली, 26 जुलाई (आईएएनएस)। पैरोल पर रिहा होने या सजा स्थगित किए जाने के बाद दोषियों के लापता होने और फिर अपराधी घोषित करने के बाद उनकी ओर से याचिका दायर करने जैसे मामलों के बढ़ते उदाहरणों से चिंतित दिल्ली उच्च न्यायालय ने ऐसी याचिकाओं को स्वीकार न करने का आदेश दिया है।

न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और अजीत भरिओक की खंडपीठ ने इस आदेश को पारित करते हुए पिछले सप्ताह कहा कि दोषियों को "प्रक्रिया के उल्लंघन और आपराधिक न्याय को पराजित करने की" अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा है, "हम इस बात को दोहराना चाहते हैं कि ऐसे मामलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है, जहां दोषियों ने अपने खिलाफ जारी की गई सजा से बचने और धोखा देने के लिए याचिकाएं दायर की हैं।"

अदालत ने कहा है, "याचिका दायर करना, और जमानत पर रिहा हो जाना और उसके बाद लापता हो जाना एक आम बात हो गई है। न्यायाधीश का यह कर्तव्य होता है कि कम से कम किसी बेगुनाह को सजा न दी जाए, लेकिन उसका यह भी कर्तव्य होता है कि वह ऐसी स्थिति में एक मूक दर्शक भी न बना रहे कि कोई दोषी ठहराया गया व्यक्ति अपनी सजा काटने से बच जाए।"

अदालत ने यह आदेश ओम बहादुर गुरंग नामक दोषी की एक याचिका को खारिज करते हुए दिया। एक निचली अदालत ने गुरंग को डकैती और हत्या के मामले में उम्र कैद की सजा सुनाई थी। वर्ष 1999 में अंतरिम जमानत पर उसे एक महीने के लिए रिहा किया गया था। लेकिन उसके बाद उसने समर्पण नहीं किया और लापता हो गया।

जब पुलिस ने उसे अपराधी घोषित करने की प्रक्रिया शुरू की तो गुरंग ने राहत के लिए अदालत से संपर्क किया।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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