स्थापत्यकला का बेजोड़ नमूना है बैद्यनाथधाम का मंदिर
मंदिर के मध्य प्रांगण में शिव के 72 फुट ऊंचे मंदिर के अलावा अन्य 22 मंदिर स्थापित हैं। मंदिर प्रांगण में एक घंटा, एक चंद्रकूप और मंदिर प्रवेश हेतु एक विशाल सिंहद्वार बना हुआ है।
कुछ लोगों की मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने करवाया है। पंडित कामेश्वर मिश्र के मुताबिक पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि रावण द्वारा शिवलिंग के रखे जाने और उसके चले जाने के बाद भगवान विष्णु स्वयं इस शिवलिंग के दर्शन के लिए पधारे थे। भगवान विष्णु ने शिव की पूजा की थी तब शिव ने विष्णु से यहां एक मंदिर निर्माण की बात कही थी। इसके बाद विष्णु के आदेश पर भगवान विश्वकर्मा ने इस मंदिर का निर्माण किया था।
मंदिर निर्माण को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्ववेताओं में काफी मतभेद हैं। कुछ इतिहासकार इसे पालकालीन मानते हैं तो कई इसे गुप्तकालीन बताते हैं। पुरातत्ववेता मोहनानंद मिश्रा के अनुसार रावणेश्वर मंदिर का निर्माण इंडो-आर्य कला का खूबसूरत उदाहरण है।
इधर, कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर देशी स्थापत्यकला पर आधारित है और यह उड़ीसा शैली से मिलती-जुलती है। पुरातत्ववेता रामशंकर की मानें तो मंदिर की स्थापत्य शैली एवं परकोटे के निर्माण से यह प्रतीत होता है कि इस मंदिर के निर्माण का प्रारंभ आदिकाल में हुआ था जबकि मंदिर का दूसरा भाग जिसे मंझला ख्ांड कहा जाता है का निर्माण गुप्तकाल में हुआ। कुछ इतिहासकार इस मंदिर का निर्माणकाल पुराणों का काल 300 ई़ पूर्व एवं 900 ई़ पूर्व माना है।
बहरहाल इतिहासकारों में इस मंदिर के निर्माण को लेकर विवाद है परंतु इतना तय है कि इस मंदिर में अब तक किसी प्राकृतिक आपदा का प्रभाव नहीं पड़ा है और आज भी यह श्रद्घा का केन्द्र बना हुआ है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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