कई कानून हैं जो कुष्ठ रोगियों को सम्मान से जीने नहीं देते
नई दिल्ली, 23 जुलाई (आईएएनएस)। भले ही सरकार कुष्ठ रोग उन्नमूलन के लिए कार्यक्रम चला रही हो लेकिन कानून में ऐसी कई खामियां हैं जो इस रोग से पीड़ितों को समाज की मुख्यधारा में लौटने से रोकती हैं।
क्या आप जानते हैं कि कुष्ठ रोग से पीड़ित कोई व्यक्ति ड्रायविंग लाइसेंस पाने के योग्य नहीं होता, वह कुछ राज्यों में स्थानीय चुनाव में खड़ा नहीं हो सकता, और यहां तक कि वह रेलगाड़ी में सफर भी नहीं कर सकता। कुष्ठ रोग के आधार पर तलाक तक लिया जा सकता है।
'लेप्रोसी मिशन ट्रस्ट इंडिया' नामक गैर सरकारी संगठन के निदेशक जेयाकुमार डेनियल ने आईएएनएस को बताया कि देश में कई ऐसे कानून हैं जो स्पष्ट रूप से कुष्ठ रोग के मरीजों के प्रति भेदभाव की वकालत करते हैं। छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, और उड़ीसा जैसे राज्यों में तो कुष्ठ रोग के मरीज स्वस्थ हो जाने के बाद भी स्थानीय निकाय अथवा पंचायत चुनाव में खड़े नहीं हो सकते।
उन्होंने कहा कि देश में कुष्ठ रोग को खत्म करने में 95 प्रतिशत सफलता हासिल की जा चुकी है। इसके बावजूद इस बीमारी को आज भी एक अभिशाप माना जाता है।
डेनियल कहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर 20 और राज्यों के स्तर पर ऐसे 40 कानून हैं जो कुष्ठ रोग के मरीजों के साथ भेदभाव करते हैं।
उन्होंने कहा कि ये लोग शहरों से काफी दूर खुद की बनाई हुई कालोनियों में दयनीय अवस्था में जीवन बिताते हैं और खुद को जिंदा रखने के लिए भीख मांगकर गुजारा करते हैं।
संगठन ने अपनी 11 मांगों के साथ राज्यसभा की याचिका समिति के अध्यक्ष एम. वेंकैया नायडू से बुधवार को मुलाकात की। संगठन चाहता है कि कानूनों में संशोधन कर कुष्ठ रोग से पीड़ितों के हितों की रक्षा की जाए।
नायडू ने आईएएनएस को बताया कि वे इस संबंध में प्रधानमंत्री को लिखेंगे कि इन कानूनों में संशोधन किया जाए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस
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