हमनें संप्रभुता को गिरवी नहीं रखा : कृष्णा (लीड-1)
इस करार को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सहित अन्य विपक्षी दलों और सरकार के सहयोगी दलों द्वारा उठाई गई आपत्तियों पर सफाई पेश करते हुए कृष्णा ने कहा, "दो संप्रभु राष्ट्रों के बीच बनी सहमति की विपक्ष जो व्याख्या कर रहा है उससे मुझे बहुत आश्चर्य हो रहा है। हमने अपनी संप्रभुता को गिरवी नहीं रखा है।"
उन्होंने कहा, "हमने अंतिम उपयोगकर्ता निगरानी संबंधी व्यवस्थाओं को लेकर सहमति दी है जिनका उल्लेख संदर्भ के तौर पर भारत द्वारा अमेरिकी रक्षा प्रौद्योगिकी व उपकरणों की खरीद के लिए भविष्य में जारी स्वीकृति पत्रों में किया जाएगा। इससे पिछली सरकारों द्वारा अमेरिका से रक्षा उपकरणों के क्रय के संबंध में की गई तदर्थ व्यवस्था सुव्यवस्थित होगी।"
कृष्णा ने कहा, "हमारे बीच द्विपक्षीय वार्ता की नई रूपरेखा पर भी सहमति बनी है जिसके तहत हमें द्विपक्षीय संबंध घनिष्ठ व व्यापक बनाने तथा भारत व अमेरिका के बीच भावी विषयवस्तु निर्धारित करने में सहायता मिलेगी।" उन्होंने दोनों देशों के बीच हुए समझौते से संबंधित साझा बयान भी सदन के पटल पर रखा।
उल्लेखनीय है कि अमेरिका से खरीदे गए सैनिक साजो सामान के अंतिम उपयोग की पुष्टि करने वाले समझौते पर सोमवार को कृष्णा और भारत यात्रा पर आई अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन की मौजूदगी में दस्तखत हुए थे।
इस करार पर दस्तखत के एक दिन बाद विपक्षी सदस्यों ने लोकसभा में सरकार पर अमेरिकी दबाव के समक्ष समर्पण करने का आरोप लगाया। भाजपा के यशवंत सिन्हा ने यह मसला शून्य काल के दौरान उठाते हुए सरकार से इस पर वक्तव्य देने की मांग की। उन्होंने कहा कि संसद का सत्र चालू रहने के दौरान सदन को विश्वास में लिए बगैर सरकार को इस करार पर हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए थे।
उन्होंने कहा, "हम अमेरिकी दबाव के समक्ष झुक रहे हैं।" समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता मुलायम सिंह यादव ने भी सिन्हा की बात का समर्थन करते हुए कहा कि इस मसले को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद ने कहा कि यह मसला किसी पार्टी से नहीं बल्कि देश के राष्ट्रीय हितों से जुड़ा वास्तविक मसला है। उन्होंने कहा, "यह सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मसला है। सरकार अमेरिकी विशेषज्ञों को हमारे रक्षा प्रतिष्ठानों के निरीक्षण की इजाजत दे रही है। हर चीज एकदम स्पष्ट होनी चाहिए।"
वामदलों ने भी इस करार पर गहरी आपत्ति व्यक्त की। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सदस्य बासुदेव आचार्य ने कहा कि इस करार पर सदन में चर्चा होनी चाहिए जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के गुरुदास दासगुप्ता ने इसे महान भूल करार दिया।
जनता दल(युनाइटेड) के नेता शरद यादव ने कहा कि भारतीय विदेश नीति विदेशी ताकत के समक्ष झुक रही है। उन्होंने सरकार से इस पर स्वत: संज्ञान लेते हुए बयान देने को कहा।
बीजू जनता दल (बीजद) के नेता भातृहरि मेहताब ने भी ऐसे ही विचार व्यक्त करते हुए कहा कि यह चिंता की बात है कि सरकार ने संसद का सत्र चालू रहते हुए इस पर हस्ताक्षर कर दिए।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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