दिल्ली उच्च न्यायालय ने बाल श्रमिकों के मामले में कार्ययोजना को मंजूरी दी
कार्ययोजना में प्रमुख प्रावधान यह है कि बाल श्रमिक के नियोक्ता पर जिला अधिकारियों द्वारा भूमि कानूनों के तहत मौके पर ही 20,000 रुपये का जुर्माना किया जाना चाहिए।
इससे पहले श्रम विभाग द्वारा अपनाई जाने वाली लंबी प्रक्रिया के कारण जुर्माना वसूली में कई कमियां थीं।
बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) के कैलाश सत्यार्थी ने आईएएनएस को बताया कि इस कार्ययोजना से विभिन्न अधिकारियों की जिम्मेदारियों के संबंध सभी भ्रम समाप्त हो जाएंगे।
बीबीए ने ही वर्ष 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करते हुए बाल श्रमिकों के पुनर्वास की स्पष्ट कार्ययोजना की मांग की थी।
सत्यार्थी ने कहा कि इससे पहले बाल श्रमिकों के मामले को देखने के संबंध में कई भ्रम थे। उदाहरण के लिए श्रम विभाग बाल श्रमिकों को नियुक्त करने वाले लोगों के खिलाफ मामले देखता था लेकिन यदि इनमें से कुछ बच्चों को तस्करी कर के लाया गया होता था तो वह इस मामले को छूता तक नहीं था।
उन्होंने कहा कि लेकिन अब कार्ययोजना ने सभी विभागों की जिम्मेदारी स्पष्ट कर दी है। बाल श्रमिकों के मामले में बंधुआ श्रम कानून, बाल श्रम कानून और किशोर न्याय अधिनियम को लागू किया जाएगा। इसके साथ ही भारतीय दंड संहिता की प्रासंगिक धाराओं को भी लागू किया जाएगा। इससे हर कोई जिम्मेदारी के दायरे में आ गया है।
उन्होंने कहा कि पहले यह एक बड़ी समस्या थी और अधिकारी केवल 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के मामले में ही कार्रवाई करते थे और 14 से 18 वर्ष के बीच के बच्चों के मामले इससे छूट जाते थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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