स्थिति में सुधार, लेकिन बजट घाटा अपरिहार्य: मुखर्जी (राउंडअप)
उन्होंने कहा कि आर्थिक विकास की दर को बढ़ाने और कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने के कारण बजट घाटे और कर्ज का बढ़ना अपरिहार्य है।
लोकसभा में बजट पर हुई चर्चा के जवाब में मुखर्जी ने कहा, "सुधार के कुछ शुरुआती लक्षण दिखने लगे हैं। मैं चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में कुछ बड़े परिवर्तन की उम्मीद करता हूं।"
वित्त मंत्री ने अपने करीब 50 मिनट के भाषण में कहा कि जून में स्टील व सीमेंट क्षेत्र में 13 फीसदी, ऑटोमोबाइल क्षेत्र की बिक्री में 13 फीसदी और कंज्युमर ड्यूरेबल सेक्टर में दहाई अंकों की वृद्धि दर्ज की गई है।
उन्होंने कहा, "यह एक छोटी शुरुआत है। हम अभी संकट से बाहर नहीं हुए हैं। वैश्विक व्यापार की स्थिति अब भी बेहतर नहीं है। इसमें कुछ और समय लगेगा। लेकिन हमारी रणनीति आंतरिक मांग को बढ़ाना और क्रय क्षमता में वृद्धि करना है।"
उन्होंने इंद्र देवता का जिक्र करते हुए कहा, "मैं दूसरों की तरह निराशावादी नहीं हूं। अब भी समय बचा हुआ है और अगर अच्छी मानसूनी बारिश होती है तो उच्च विकास दर हासिल करना संभव हो सकेगा।"
उन्होंने बढ़ते बजट घाटे व सरकारी खर्च के संदर्भ में कहा, "मुझे यह खतरा लेना पड़ा, लेकिन मैं मानता हूं कि उधार की इस दर को बनाए रखना संभव नहीं है। हमें उच्च आर्थिक विकास की दर पर लौटना पड़ेगा।"
मुखर्जी ने कहा कि चर्चा के दौरान कुछ सदस्यों द्वारा की गई आलोचना से वह अवगत हैं, विशेषकर उच्च सरकारी उधार, जो बढ़कर 391,000 करोड़ रुपये हो गया है, और बजट घाटे को लेकर।
पिछले वित्त वर्ष 6.7 फीसदी के विकास दर के संदर्भ में उन्होंने कहा, "वित्त मंत्री के रूप में मैंने साहसिक कदम उठाया है। इस आशा के साथ कि बदलाव होगा।"
मुखर्जी ने विनिवेश के मुद्दे पर स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि छह जुलाई को पेश आम बजट में विनिवेश के बारे में बहुत कुछ नहीं कहे जाने से कुछ निराशा है।
उन्होंने कहा, "संभवत: लोग कंपनियों के नाम और यह जानना चाहते थे कि विनिवेश से कितना धन इकट्ठा किया जाएगा।" उन्होंने कहा कि सरकार की विनिवेश नीति वही है जिसकी घोषणा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद के संयुक्त अधिवेशन में की थी।
उन्होंने कहा कि सार्वजनिक कंपनियों में हिस्सेदारी घटाने की प्रक्रिया पहले से शुरू है। वित्त मंत्रालय में कंपनियों की पहचान करने के बारे चर्चाएं हो रही है। इस बारे में समय आने पर विस्तृत जानकारी दी जाएगी।
मुखर्जी ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम राष्ट्र की संपत्ति हैं और उसका एक हिस्सा जनता के हाथों में रहना चाहिए। इस तरह कंपनियों में 51 फीसदी हिस्सेदारी अपने पास रखते हुए सरकार जनता को विनिवेश प्रक्रिया में भागीदार बनने के लिए प्रोत्साहित करेगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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