श्रीलंका में संघर्ष खत्म होने के बाद भी तमिल शरणार्थी शिविरों में फंसे
कोलंबो, 14 जुलाई (आईएएनएस)। श्रीलंका में तमिल विद्रोहियों के खिलाफ निर्णायक हमले के दौरान विस्थापित हुए 270,000 लोग अभी भी सरकारी राहत शिविरों में रहने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं और सफाई की कमी है।
इसके साथ ही एक ही शिविर में रह रहे परिवार के सदस्यों को भी मिलने नहीं दिया जा रहा है। कुछ घायलों ने अपने बेहतर इलाज के लिए राहत शिविरों से बाहर जाने का अधिकार पाने के लिए न्यायालयों का भी दरवाजा खटखटाया है।
सोपिका सुरेंद्रनाथन (30 वर्ष) पिछले दिसम्बर में मोर्टार हमले में घायल हुई थी। एक वकील ने उसके परिवार की ओर से सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करके राहत शिविरों में अपर्याप्त चिकित्सा सुविधा की सूचना देते हुए पिछले हफ्ते उसके समुचित इलाज का आदेश पाने में सफलता हासिल की।
सोपिका का मामला एक अपवाद भर है और अधिकांश तमिलों के पास अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए वकीलों को देने के लिए पैसे नहीं हैं।
राहत शिविरों के लोगों को उनके गांवों को लौटने का आदेश नहीं दिया जा रहा है। यद्यपि उनकी इच्छा अपने गांव वापस जाकर खेती करने और मछली पकड़ने की है।
सरकार का कहना है कि सुरक्षा कारणों से विस्थापितों को वापस लौटने की अनुमति नहीं दी जा रही है। सरकार के अनुसार राहत शिविरों में जांच के दौरान करीब 10,000 तमिल विद्रोहियों को पकड़ा गया है या उन्होंने समर्पण किया है। इनमें कुछ सक्रिय लड़ाई में हिस्सा भी ले चुके हैं।
सरकार कुछ विदेशी स्वयंसेवी संस्थाओं पर तमिल विद्रोहियों के प्रति सहानुभूति रखने का आरोप लगाते हुए राहत शिविरों में स्वयंसेवी संस्थाओं के कार्यकर्ताओं के प्रवेश को कड़ाई से नियंत्रित कर रही है।
सरकार ने कहा कि वह लड़ाई वाले इलाकों में बारूदी सुरंगों को हटाने का काम कर रही है और इसके पूरा होने के बाद ग्रामीणों को वापस लौटने की अनुमति दी जाएगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।


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