काश कई चंद्रशेखर होते!

चंद्रशेखर को गए दो साल हो गए। पिछली लोकसभ के लिए बलिया से चुनकर आए थे। आते ही बीमार पड़ गए लिहाजा बहुत सक्रिय नहीं रहे लेकिन उसके पहले चंद्रशेखर के बिना संसद की कार्यवाही के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। 1962 में चंद्रशेखर ने राज्यसभा में प्रवेश किया था उसके बाद से एकाध बार को छोड़कर लगातार लगातार किसी न किसी सदन के सदस्य रहे। और जब भी सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया, राजनीति को जनहित और राष्ट्रहित में इस्तेमाल करने की प्रेरणा देते रहे।
1927 में जन्मे चंद्रशेखर ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र में एमए पास किया था। उस वक्त की कोई भी नौकरी पा सकते थे लेकिन आचार्य नरेंद्र देव की प्रेरणा से उन्होंने देशसेवा का व्रत लिया। आचार्य जी को विश्वास था कि नवस्वतंत्र राष्ट्र को चंद्रशेखर जैसे तपस्वियों की जरूरत थी। समाजवादी आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में चंद्रशेखर ने उत्तरप्रदेश से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की।
आचार्य जी, डा. राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में समाजवादी आंदोलन की आवाज दूर दूर तक पहुंची और उस अभियान में अन्य लोगों के अलावा चंद्रशेखर का बड़ा योगदान था। जब देश की आजादी के बाद कांग्रेस में जड़ जमाए पुरातनपंथी नेता कमजोर हुए और जवाहर लाल नेहरू ने सोशलिस्टिक पैटर्न ऑफ सोसाइटी स्थापित करना कांग्रेस का उद्देश्य बनाया तो बड़ी संチया में समाजवादी लोग कांग्रेस में शामिल हो गए जिनमें अशोक मेहता जैसे महान समाजवादी भी थे। 1965 में चंद्रशेखर ने कांग्रेस की सदस्यता हासिल की।
चंद्रशेखर ने इस देश के एक बहुत बड़े वर्ग को लोकतांत्रिक तरीके से राजनीतिक विरोध करने की तमीज सिखाई। कांग्रेस में रहते हुए उन्होंने पूंजीपति घरानों के शिकंजे में लगातार फंसती जा रही कांग्रेस पार्टी को बार-बार आगाह किया। 1969 में यंग इंडियन की स्थापना की और तार्किक राजनीति को बढ़ावा दिया। चंद्रशेखर के व्यक्तित्व में वह ताकत थी कि उनका सिर किसी के सामने नहीं झुकता था।
अपनी राजनीतिक सत्ता के शीर्ष पर पहुंच चुकी इंदिरा गांधी को भी चंद्रशेखर ने समझा दिया था कि लोकतंत्र की राजनीति में मनमानी नहीं चलती। शिमला में 1970 में इंदिरा गांधी और उनके भक्तों की मर्जी के खिलाफ वे कांग्रेस कार्यसमिति का चुनाव लड़े और जीते। चंद्रशेखर कांग्रेस के अंदरूनी लोकतंत्र के अंतिम स्तंभ थे। उसके बाद कांग्रेस किसी भी चंद्रशेखर को बरदाश्त नहीं कर सकी। महात्मा गांधी और नेहरू की कांग्रेस का चारण युग शुरू हो चुका था।
संजय गांधी के मनमानी के दौर के शुरू होने के बाद चंद्रशेखर ने बार-बार इंदिरा गांधी को चेतावनी दी लेकिन कोई असर नहीं हुआ। चंद्रशेखर ने इंदिरा जी को जय प्रकाश नारायण से भी सुलह करने को कहा था लेकिन जवाब में इंदिरा गांधी ने उन्हें जेल में डाल दिया था। पूरी इमर्जेंसी चंद्रशेखर जेल में रहें। 1977 में कांग्रेस की हार के बाद वे नवगठित जनता पार्टी के अध्यक्ष बने और 1988 तक उस पद पर रहे। जब 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह को संसद में अविश्वास मत लाकर हटा गया तो चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री पद स्वीकार करके देश में राजनीतिक स्थिरता लाने की कोशिश की और तत्कालीन चुनाव संपन्न करवाया।
चंद्रशेखर को एक बहुत बड़े राजनीतिक प्रचारक के रूप में भी याद किया जाएगा। कन्या कुमारी से दिल्ली तक की उनकी पदयात्रा को समकालीन राजनीतिशास्त्र के विद्यार्थी एक जन-जागरण अभियान के रूप में देखते हैं। लोकसभा के अंदर चंद्रशेखर नब्बे के दशक में अपनी पार्टी के अकेले नेता होते थे लेकिन जब भी खड़े होते थे, दोनों पक्षों के लोग शांत हो जाते थे।
आज चंद्रशेखर की दूसरी पुण्यतिथि है। सबको दुआ करनी चाहिए कि इस देश की राजनीति में बहुत सारे चंद्रशेखर पैदा हों।


Click it and Unblock the Notifications