उमर के बागडोर थामने के बाद से घाटी में विरोध-प्रदर्शन बढ़े

श्रीनगर, 7 जुलाई (आईएएनएस)। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों को कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति को ही घाटी में जारी विरोध प्रदर्शनों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है।

यह पहला मौका नहीं जब कश्मीरी महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बूढ़े केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ)पर बलात्कार का आरोप लगाते हुए सड़कों पर उतर आए हैं। लेकिन जिस पैमाने पर ये प्रदर्शन हो रहे हैं उनसे प्रशासन हैरान हैं। हालांकि आतंकवादी घटनाओं में कमी आई है। मुस्लिम बहुल घाटी में करीब-करीब हर बात के विरोध में प्रदर्शन हो रहे हैं।

अनुमान है कि अलगाववादी राजनीतिक गुट हालात का फायदा उठा रहे हैं। सुरक्षा बलों पर ज्यादतियों का आरोप लगाकर किए जाने वाले विरोध प्रदर्शनों में हिंसा हो रही है और इस प्रकार यह दुष्चक्र सा बन गया है। और इस सबके लिए उमर अब्दुल्ला की आलोचना हो रही है।

इस साल के आरंभ में सत्ता की बागडोर थामने वाले अब्दुल्ला मानवाधिकारों के उल्लंघन को कतई बर्दाश्त नहीं करने की नीति को मानते हैं। उन्होंने स्वयं भी कहा है कि सेना, अर्धसैनिक बलों या जम्मू कश्मीर पुलिस की ज्यादतियों पर पर्दा डालने की बजाए वह पद छोड़ना मुनासिब समझेंगे।

श्रीनगर के एक सम्मानित नागरिक ने नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर बताया, "मुख्यमंत्री की प्रतिबद्धता ने एक तरह से लोगों को विरोध प्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित किया है। इसकी वजह से प्रशासन जनता से किए वादे निभाने के लिए बेहद दबाव में हैं।"

ऐसा लग रहा है कि ज्यादातर लोगों ने जम्मू एवं कश्मीर में किसी भी सूरत में मानवाधिकारों का उल्लंघन बर्दाश्त नहीं करने का संकल्प ले लिया है।

अब्दुल्ला ने गृहमंत्री पी. चिदंबरम को इस बात पर राजी कर लिया है कि धीरे-धीरे सीआरपीएफ की जगह पुलिस ले लेगी। बहुत से लोगों को लगता है कि पुलिस का काम ज्यादा बेहतर होगा।

मुजफ्फर अहमद नाम के एक स्थानीय शिक्षक के अनुसार, "ऐसे संकेत हैं कि राज्य सरकार समस्या के समाधान मे पारदर्शिता की वकालत कर रही है। इन कदमों से यह भी जाहिर होता है कि सरकार का मानना है कि आतंकवाद का सामना किया जा सकता है।"

एक सेवानिवृत्त अधिकारी के अनुसार, "लोगों द्वारा सड़कों पर जाम लगाने के बाद जिला मैजिस्ट्रेट और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तत्काल मौके पर पहुंच जाते हैं और मसला सुलझाते हैं। यह स्वागतयोग्य है लेकिन सरकार के सामान्य कामकाज में इनसे रुकावट होती है।"

पिछले छह महीनों से गांव में बिजली का ट्रांसफार्मर खराब होने, अच्छी सड़कों के अभाव, पानी की किल्लत की वजह से प्रदर्शन हुए हैं। इनके अलाव हिरासत में मौतों, यातनाओं और लोगों के गायब होने के विरोध में भी लोग सड़कों पर उतरे हैं।

बहुत से स्थानों पर क्रुद्ध प्रदर्शनकारियों से निपटते समय सुरक्षा बल अत्याधिक बल प्रयोग के दोषी भी ठहराए गए हैं जिनकी वजह से किसी की जान भी चली जाती है। खुफिया विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, "प्रदर्शन के दौरान हुई एक मौत की और ज्यादा बड़ी प्रतिक्रिया होती है।"

पुलिस भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार बशीर मंजर के अनुसार शोपियां में दो युवतियों के बलात्कार एवं हत्या मामले में पुलिस प्रशासन ने शुरुआती पांच दिन बर्बाद कर दिए।

मुख्यमंत्री के प्रशंसक और आलोचक चाहते हैं कि वह ऐसा प्रशासन बनाए जो चीजों को दुरुस्थ करने के लिए किसी विरोध प्रदर्शन का मोहताज न हो।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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